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बड़ा होता है पालनहार: शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज

yashoda-krishnaभगवान कृष्ण को देवकी ने जन्म दिया था, लेकिन उन्हें पाल-पोस कर बडा किया यशोदा मां ने। माना जाता है कि जन्म देने वाले से पालने वाला बडा होता है।
यशोदा ने श्रीकृष्ण को जन्म नहीं दिया था। पालन-पोषण किया था। उन्हें संस्कार देने का पूरा प्रयत्न किया था। मां से भी बढकर। यह उनका क‌र्त्तव्य था। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि जन्म देने से ज्यादा महत्व पालने वाले का होता है। जन्म देने वाली मां जननी हो सकती है, लेकिन चुनौतियों से जूझने की शक्ति वही मातृ-शक्ति दे सकती है, जो बच्चे में संस्कार भरे।
यशोदा जी को नहीं मालूम था कि श्रीकृष्ण भगवान विष्णु का अवतार हैं, इसलिए उन्होंने बालक कृष्ण के साथ वैसा ही व्यवहार किया, जैसे एक ममतामयीमां करती है। उन्हें प्यार से दुलराया,पालने में झुलाया, ठुमक-ठुमक कर चलते हुए देखकर खुश हुई, तो उद्दंडता करने पर उनसे स्पष्टीकरण मांगा और दोषी मानकर उन्हें दंड भी दिया। कृष्ण के घर आने से उनके यहां उत्सव जैसा माहौल हो गया था। यदि उन्हें श्रीकृष्ण के ईश्वर होने का पता भी होता, तब भी वे श्रीकृष्ण को अपना कान्हाही समझतीं। क्योंकि यशोदा श्रीकृष्ण को पाकर वात्सल्य का झरना बन चुकी थीं। उन्होंने सिर्फ श्रीकृष्ण का ही लालन-पालन नहीं किया, बल्कि रोहिणी के पुत्र बलराम को भी मां की ममता और परवरिश दी।
धार्मिक ग्रंथों और भक्तिकालीनकवियों द्वारा श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का इतना सजीव चित्रण बिना यशोदा के वात्सल्य भाव के संभव नहीं था। माता यशोदा के यहां रहकर ही श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में कंस के भेजे हुए राक्षसों का वध कर दिया। यशोदा को हमेशा लगता रहा कि यह बालक विशिष्ट तो है, लेकिन उनका हृदय उन्हें अबोध बालक के रूप में ही स्वीकार करता रहा। यह मां का हृदय था, जो अपनी संतान को हर विपत्ति से बचाने को तत्पर रहता है। पूतना,शकटासुर,धेनुकजैसे असुरों के वध के बावजूद यशोदा श्रीकृष्ण को अबोध बालक ही अनुभव करती रहीं।
उन्होंने श्रीकृष्ण के कार्यकलापों पर पूरा ध्यान रखा। उन्हें गोप और बलराम से पता चला कि बालक कृष्ण ने मिट्टी खाई है, तो वे चिंतामग्न हो गईं। तुरंत कृष्ण से कहा- मुंह खोलो। यह बात दूसरी है कि कृष्ण के मुंह में यशोदा को मिट्टी की जगह पूरा ब्रह्मांड दिखा। इसी तरह गोपिकाओं की माखन चुरा कर खाने की शिकायत मिलने पर भी मां यशोदा ने कृष्ण से सवाल-जवाब किए। दोषी पाए जाने पर दंड दिया। उन्हें ओखली से बांध दिया। लेकिन कृष्ण के तर्र्कोके आगे आखिरकार यशोदा हर बार वात्सल्य की नदी बन जातीं। कृष्ण के मथुरा जाने के बाद वे देवकी को संदेश भिजवाती हैं कि कृष्ण को तो सुबह माखन-रोटी खाने की आदत है। प्रसंग आता है कि बचपन में बलराम कृष्ण को चिढाते हैं कि तू यशोदा का पुत्र नहीं है। उन्होंने तुम्हें मोल लिया है। इससे कृष्ण यशोदा से प्रश्न करते हैं कि मेरी मां कौन है? इस पर मां यशोदा अपना पूरा प्यार कृष्ण पर लुटा देती हैं और कहती हैं -मै ही तेरी मां हूं और तू मेरा ही पुत्र है। यशोदा ने भले ही सच न बोला हो, लेकिन झूठ भी नहीं बोला था। क्योंकि मां वही होती है, जो प्यार देने के साथ-साथ बच्चे को गलत मार्ग की ओर जाने पर दंडित भी करे। यशोदा जी हैं पालनहार।

द्वारा,
परम पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज,
प्रधान पीठ, द्वारका (गुजरात)

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