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Morari Bapu in Nathdwara: तीसरा दिन

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(सीधे श्री नाथद्वारा से आर्य मनु की रिपोर्ट )

जब वाहे गुरु को याद किया तो बापू ने कुछ इस तरह अपने सिर को ढंका

श्री नाथद्वारा. “कलयुग केवल नाम अधारा, जपत जपति नर होय पारा” कलयुग में केवल नाम ही प्रभु स्मरण का एकमात्र आधार है. तुम राम का नाम लेते हो या कृष्ण का.. या किसी का भी.. उस में दिक्कत नहीं.. बस केवल नाम लो और उसमे प्रभु का स्मरण करो.. यही कलयुग में भाव पार होने का एकमात्र साधन है.”
ये विचार व्यक्त किये शीतल संत मोरारी बापू ने. वे कथा के तृतीय दिवस लोगो से मुखातिब हो रहे थे. बापू ने कहा कि उनका व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि प्रेम से ऊँचा धरती पर कुछ नहीं. केवल प्रेम ही है जो सभी को बांधे रखता है. “सबसे ऊँची प्रेम सगाई ” प्रेम के वशीभूत हो ईश्वर, जब बुलाओ दौड़े चले आते है. विश्वास ना हो तो द्रोपदी से पूछ लो. जब धर्मसभा में भीष्म पितामह जैसे अकेले कुरु तक ने सिर झुका लिया और साडी का अकेला छोर बचा तो द्रोपदी दोनों हाथ उठाकर केवल कृष्ण को पुकारने लगी. और कृष्ण… वो तो जैसे तैयार ही बैठे थे. अचानक पीताम्बरी साडी ने आकार द्रोपदी को जैसे ढक दिया.

प्रेम की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए बापू ने कहा कि प्रेम में इतनी क्षमता है कि वह प्रभु को भी प्रकट कर सकता है. मानस के छंद ” हरी व्यापक सर्वत्र समाना” . बापू ने कहा कि प्रेम है तो ईश्वर है. रामकथा से प्रेम है अर्थात ईश्वर से प्रेम. बापू ने कहा कि उनका मानना है कि इक्कीसवी सदी का सबसे बड़ा मन्त्र है प्रेम. बस इस प्रेम में कोई अहेतु नहीं होना चाहिए. आज बापू ने फ़िल्मी गीत भी खूब गुनगुनाये.

डम डम डिगा डिगा की शुरुआत नाथद्वारा से :

बापू ने कहा कि वे अक्सर कथाओं में लोक गीत, भजन, शायरी, गजल के साथ साथ फ़िल्मी गीत भी सुना देते है. पर उनका ध्येय केवल और केवल ईश्वर को रिझाना होता है. वे भीड़ को इकठ्ठा करने या रिझाने के लिए ऐसा नहीं करते. याद करते हुए बापू ने कहा कि वे कई साल पहले मिराज के मालिक मदन पालीवाल की बेटी की शादी में आये थे. वहाँ नितिन मुकेश मंच से गा रहे थे. “डम डम डिगा डिगा ” उन्हें ये गीत जम गया और अगली ही कथा शिमला में मंच से गा भी दिया.

बापू ने कहा कि साधू समाज ने आरम्भ में इसके लिए उनकी आलोचना की किन्तु वे अपने भक्ति पाठ से नहीं डिगे तो आज साधू समाज भी उनके साथ डम डम डिगा डिगा गा लेते है.

शिव बारात का अनोखा वर्णन:

राम चरितमानस में वर्णित शिव विवाह का बहुत ही रोचक वर्णन बापू ने आज मंच से किया. शिव के श्रृंगार से लेकर उनके नंदी पर उल्टा बैठने तक के प्रत्येक अंश की  बापू ने व्याख्या करके मर्म समझाया. कई जगह श्रोताओं को खूब हँसाया. जब “शिव तांडव नाचे” की धुन चली तो पूरे माहौल को शिवमय कर दिया.

 

बड़े तिलकायत पधारे:

आज कथा में श्रीनाथ मंदिर के बड़े तिलकायत महाराज पधारे. तिलकायत महाराज ने शाल ओढाकर नगर में पधारे मोरारी बापू का मंदिरजी की ओर से अभिनन्दन किया. बापू ने भी व्यास पीठ की ओर से तिलकायत महाराज का अभिनन्दन किया.

 

मुस्लिम समुदाय ने बापू का स्वागत किया:

कथा के दौरान उस वक़्त माहोल अल्लाह्मय हो गया जब मुस्लिम समुदाय के लोगो ने बापू का मंच पर आकार सम्मान किया और ईद की बधाई दी. बापू ने भी समस्त राष्ट्र को ईद मुबारकबाद दी. एक फ़कीर बापू को उपरना ओढा कर चला गया. बापू इस पर भाव विहल हो उठे. बापू ने कहा, ये राजस्थान की गंगा जामुनी संस्कृति है जहाँ एक मुस्लिम फ़कीर श्रीनाथ जी का केसरिया दुपट्टा उन्हें समर्पित करके जाता है. बाद में बापू ने उस उपरने को सिर पर फेंटे की तरह बांध लिया.

 

राम रसोड़े में 56 भोग सा नज़ारा : 

कथा के दौरान नौ दिवसीय चल रहे राम रसोड़े में सभी को प्रेम से भोजन जिमाया जा रहा है. आज भोजन मीनू में आम रस, मूंग , पीली दाल, दुप्पद रोटी, गोभी की सब्जी, चावल, हलवा, राब आदि थे.  दो लाख स्क्वायर फीट में बने राम रसोड़े के गेट पर काफी लंबी लाइन लगी हुई थी. पूरे नाथद्वारा में कुम्भ सा नज़ारा है.

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