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दो शब्दों में गीता रहस्य : योगी अशोकानन्द जी

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गीता में तो कृष्ण भगवान दो ही शब्द कहना चाहते हैं। ये दो शब्द, लोग समझ सकें, ऐसे नहीं है, इसलिए गीता के स्वरूप को इतना विस्तृत किया और उस स्वरूप को समझने के लिए लोगों ने फिर से विवेचन किया। कृष्ण भगवान ने खुद कहा है कि ‘गीता में मैं जो कहना चाहता हूँ, उसका स्थूल अर्थ एक हजार में से एक व्यक्ति ही समझ सकता है, ऐसे एक हजार स्थूल अर्थ को सyogi ashokanandमझनवालों में से एक व्यक्ति उसका सूक्ष्म अर्थ समझ सकता है, ऐसे एक हजार सूक्ष्म अर्थ को समझनेवालों में से एक व्यक्ति सूक्ष्मतर अर्थ को समझनेवालों में से एक व्यक्ति गीता का सूक्ष्मतम अर्थ अर्थात् मेरे आशय को समझ सकता है।’ वह एक व्यक्ति ही कृष्ण भगवान क्या कहना चाहते थे, समझ सकता है। अब इस साढ़े तीन अबज की जनसंख्या में किस का नंबर लगेगा?

कृष्ण भगवान जो कहना चाहते थे, वह दो शब्दों में ही कहना चाहते है। वह तो जो कृष्ण बना है, वही समझ सकता है और कह सकता है। आज ‘हम’ खुद कृष्ण बनकर आए हैं, तुझे तेरा जो कार्य सिद्ध करना है, कर ले।

कृष्ण भगवान क्या कहना चाहते हैं कि इन्सान जब मर जाता है तो कहते हैं, ‘अंदरवाला चला गया’। तो वह क्या है? वह ‘माल’ है और जो यहाँ पड़ा है वह ‘खोखा’ है। इन आँखों से जो दिखता है, वह पेकिंग है और अंदर ‘माल’ है, मटिरिअल है। देर आर वेराइटिज ऑफ पेकिंग्ज। कोई आम का पेकिंग है, कोई गधे का पेकिंग है, कोई पुरुष का है या स्त्री का है। लेकिन अंदर ‘माल’ स्वच्छ एक जैसा सबमें है। पेकिंग तो कैसा भी हो, सड़ा हुआ भी हो, लेकिन व्यापारी पेकिंग की जाँच नहीं करता। वह तो ‘माल’ ठीक है या नहीं, वही देखता है। वैसे ही हमें भीतर ‘माल’ के दर्शन करने चाहिए।

कृष्ण भगवान कहते हैं, ”भीतर जो ‘माल’ है, वो ही मैं खुद हूँ, वो ही कृष्ण है, उसे पहचान, तभी तुम परिणाम को प्राप्त कर सकोगे।’ बाकी लाख अवतार तक गीता के श्लोक गाओगे तो भी परिणाम नहीं आएगा। ‘खोखा’ और ‘माल’ इन दो शब्दों में वह सब है, जो कृष्ण भगवान कहना चाहते थे और इसी में कृष्ण भगवान का ‘अंतर आशय’ समा जाता है।

भगवान ने गीता में कहा है ‘अभ्यास करना’, आजकल तो गीता का इतना अभ्यास हो रहा है कि अभ्यास का ही अध्यास हो गया है। भगवान ने अध्यास छोडऩे के लिए अभ्यास करने को कहा था, तो अभ्यास का ही अध्यास हो गया?
श्री कृष्ण ने उसे व्यभिचारिणी कहा!

सत्पुरुष को, ज्ञानीपुरुष को सुनने से जो बुद्धि स्वच्छ होतीहै, वहअव्यभिचारिणी बुद्धि कहलाती है। इन सबकी विपरीत बुद्धि है। कृष्ण भगवान ने कहा है कि बुद्धि अव्यभिचारिणी चाहिए। व्यभिचारिणी अर्थात् विपरीत बुद्धि। आजकल संसार में इन सबकी विपरीत बुद्धि ही है। जो निरंतर अपना अहित कर रहा है, एक क्षण के लिए भी अपना हित नहीं कर रहा और विपरीत बुद्धि को ही सम्यक् मानता है।

चिंता और अहंकार

श्री कृष्ण कहते हैं : ‘जीव तू क्यों चिंता करता है, कृष्ण को कहना हो वह करे’ तो यह क्या कहते हैं, मालूम है? कृष्ण को क्या? वे तो जो कहना है, कहेंगे, लेकिन(हमें) यह संसार चलाना है, तो चिंता के कारखाने शुरू किए। लेकिन यह माल तो बिकता ही नहीं, कैसे बिकेगा? जहाँ बेचने जाता है, उसका तो अपना कारखाना होना ही है। इस संसार में एक ऐसा व्यक्ति ढूंढकर लाओ, जिसे चिंता नहीं होती।
Kanhaji
एक ओर कहता है, ‘श्री कृष्ण शरणम् मम:’ और दूसरी और कहता है कि’हे कृष्ण! तू मेरी शरण में आ’। यदि कृष्ण की शरण ली है तो फिर चिंता क्यों? महावीर भगवान ने भी चिंता करने के लिए मना किया है। उन्होंने तो एक बार की गई चिंता का फल तिर्यंच गति बताया है। चिंता तो उच्चतम अहंकार है। ‘मैंही सबका कत्र्ता हूँ’ ऐसा तीव्र भाव रहता हो तो उसके फलस्वरूप चिंता उत्पन्न होती है।

भगवान का सच्चा भक्त तो चिंता होने पर भगवान से भी झगड़ता है। आप ना बोलते हैं तो मुझे चिंता क्यों होती है? जो भगवान से झगड़ता नहीं, वह सच्चा भक्त नहीं। यदि आपको कोई तकलीफ आती है तो आपके अंदर भगवान बैठा है, उसे हिलाईए। भगवान का सच्चा भक्त मिलना भी मुश्किल है। सब अपने अपने स्वार्थ में घूम रहे हैं।

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