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Morari Bapu

morari bapu
मोरारी बापू का जन्म 25 सितम्बर, 1946 के दिन महुआ के समीप तलगारजा (सौराष्ट्र) में वैष्णव परिवार में हुआ। पिता प्रभुदास हरियाणी के बजाय दादाजी त्रिभुवनदास का रामायण के प्रति असीम प्रेम था। तलगारजा से महुआ वे पैदल विद्या अर्जन के लिए जाया करते थे। 5 मील के इस रास्ते में उन्हें दादाजी द्वारा बताई गई रामायण की 5 चौपाइयाँ प्रतिदिन याद करना पड़ती थीं। इस नियम के चलते उन्हें धीरे-धीरे समूची रामायण कंठस्थ हो गई।

दादाजी को ही बापू ने अपना गुरु मान लिया था। 14 वर्ष की आयु में बापू ने पहली बार तलगारजा में चैत्रमास 1960 में एक महीने तक रामायण कथा का पाठ किया। विद्यार्थी जीवन में उनका मन अभ्यास में कम, रामकथा में अधिक रमने लगा था। बाद में वे महुआ के उसी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक बने, जहाँ वे बचपन में विद्यार्जन किया करते थे, लेकिन बाद में उन्हें अध्यापन कार्य छोड़ना पड़ा, क्योंकि रामायण पाठ में वे इतना डूब चुके थे कि समय मिलना कठिन था।

महुआ से निकलने के बाद 1966 में मोरारी बापू ने 9 दिन की रामकथा की शुरुआत नागबाई के पवित्र स्थल गाँठिया में रामफलकदासजी जैसे भिक्षा माँगने वाले संत के साथ की। उन दिनों बापू केवल सुबह कथा का पाठ करते थे और दोपहर में भोजन की व्यवस्था में स्वयं जुट जाते। ह्वदय के मर्म तक पहुँचा देने वाली रामकथा ने आज बापू को दूसरे संतों से विलग रखा हुआ है।

मोरारी बापू का विवाह सावित्रीदेवी से हुआ। उनके चार बच्चों में तीन बेटियाँ और एक बेटा है। पहले वे परिवार के पोषण के लिए रामकथा से आने वाले दान को स्वीकार कर लेते थे, लेकिन जब यह धन बहुत अधिक आने लगा तो 1977 से प्रण ले लिया कि वे कोई दान स्वीकार नहीं करेंगे। इसी प्रण को वे आज तक निभा रहे हैं।

मोरारी बापू दर्शन के प्रदर्शन से प्रदर्शन के दर्शन से काफी दूर हैं। कथा करते समय वे केवल एक समय भोजन करते हैं। उन्हें गन्ने का रस और बाजरे की रोटी काफी पसंद है। सर्वधर्म सम्मान की लीक पर चलने वाले मोरारी बापू की इच्छा रहती है कि कथा के दौरान वे एक बार का भोजन किसी दलित के घर जाकर करें और कई मौकों पर उन्होंने ऐसा किया भी है।

बापू ने जब महुआ में स्वयं की ओर से 1008 राम पारायण का पाठ कराया तो पूर्णाहुति के समय हरिजन भाइयों से आग्रह किया कि वे नि:संकोच मंच पर आएँ और रामायण की आरती उतारें। तब डेढ़ लाख लोगों की धर्मभीरु भीड़ में से कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया और कुछ संत तो चले भी गए, लेकिन बापू ने हरिजनों से ही आरती उतरवाई।

सौराष्ट्र के ही एक गाँव में बापू ने हरिजनों और मुसलमानों का मेहमान बनकर रामकथा का पाठ किया। वे यह बताना चाहते थे कि रामकथा के हकदार मुसलमान और हरिजन भी हैं। बापू की नौ दिवसीय रामकथा का उद्देश्य है- धर्म का उत्थान, उसके द्वारा समाज की उन्नति और भारत की गौरवशाली संस्कृति के प्रति लोगों के भीतर ज्योति जलाने की तीव्र इच्छा।

मोरारी बापू के कंधे पर रहने वाली ‘काली कमली’ (शॉल) के विषय में अनेकानेक धारणाएँ प्रचलित हैं। एक धारणा यह है कि काली कमली स्वयं हनुमानजी ने प्रकट होकर प्रदान की और कुछ लोगों का मानना है कि यह काली कमली उन्हें जूनागढ़ के किसी संत ने दी, लेकिन मोरारी बापू इन मतों के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं कि काली कमली के पीछे कोई रहस्य नहीं है और न ही कोई चमत्कार। मुझे बचपन से काले रंग के प्रति विशेष लगाव रहा है और यह मुझे अच्छी लगती है, सो इसे मैं कंधे पर डाले रखता हूँ।

किसी भी धार्मिक और राजनीतिक विवादों से दूर रहने वाले मोरारी बापू को अंबानी परिवार में विशेष सम्मान दिया जाता है। स्व. धीरूभाई अंबानी ने जब जामनगर के पास खावड़ी नामक स्थान पर रिलायंस की फैक्टरी का शुभारंभ किया तो उस मौके पर मोरारी बापू की कथा का पाठ किया था। तब उन्होंने धीरूभाई से पूछा कि लोग इतनी दूर से यहाँ काम करने आएँगे तो उनके भोजन का क्या होगा? बापू की इच्छा थी कि अंबानी परिवार अपने कर्मचारियों को एक समय का भोजन दे और तभी से रिलायंस में एक वक्त का भोजन दिए जाने की शुरुआत हुई। यह परंपरा अब तक कायम है।

मोरारी बापू अपनी कथा में शेरो-शायरी का भरपूर उपयोग करते हैं, ताकि उनकी बात आसानी से लोग समझ सकें। वे कभी भी अपने विचारों को नहीं थोपते और धरती पर मनुष्यता कायम रहे, इसका प्रयास करते रहते हैं। उनकी इच्छा थी कि पाकिस्तान जाकर रामकथा का पाठ करें, लेकिन वीजा और सुरक्षा कारणों से ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।

आज न जाने कितने लोग हैं, जो बापू के ऐसे भक्त हो गए कि उनके पीछे-पीछे हर कथा में पहुँच जाते हैं और रामकथा में गोते लगाते रहते हैं। आज के दौर में जिस सच्चे पथ-प्रदर्शक की जरूरत महसूस‍ की जा रही है, उसमें सबसे पहले मोरारी बापू का नाम ही जुबाँ पर आता है, जो सामाजिक मूल्यों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का अलख जगाए हुए हैं।

 

आ लग जा गले, फिर कभी हसीं रात हो ना हो… 
नाथद्वारा। कसमें वादे प्यार वफा सब, बाते हैं बातों का क्या…..आसमान में उडऩे वाले, मिट्टी में मिल जाएगा… जैसे बोल के साथ आवाज पांडाल मेंं गूंजी तो हर कोई मदमस्त हो गया। देर तक पांडाल में तालियों की गडग़ड़ाहट होती रही। मिराज गु्रप के मुरारी बापू इन नाथद्वारा कार्यक्रम के तहत गुरुवार रात को रूपकुमार राठौड़ व सोनाली राठौड़ ने जुगलबंदी में एक से बढ़कर एक भक्ति के ऐसे रंग बिखेरे कि मुरारी बापू भी दाद देते रहे। कार्यक्रम की शुरूआत 7 बजे के करीब हुई।सोनाली राठौड़ ने पायो जी मैंने राम रतन धन पायो…भजन से शुरुआत की। पांडाल में जैसे ही सोनाली की सुरिली आवाज गूंजी तो अध्यात्म की नगरी पर जैसे राम रतन धन की वर्षा हो गई। सोनाली ने मीरा का गीत चालो माही देश सुना कर खूब तालियां बटोरी। ख्वाजा मेरे ख्वाजा..गाने से रूप कुमार राठौड़ ने शुरुआत की। अपनी दमदार आवाज में रूप ने करीब 25 हजार श्रोताओं को ख्वाजा की ऐसी दुआ सुनाई कि सभी मंत्रमुग्ध हो गए। श्रोताओं ने करतल ध्वनि के साथ रूप का साथ दिया। सोनाली ने सुरिली, मीठी आवाज में श्रोताओं को इश्क का कलमा पढ़ाया। उन्होंने मुझे इश्क का कलमा, इश्क का कलमा, याद रहा मैं बाकी सब भूल गई, एक नाम पिया का याद रहा… का कलमा सुनाया। लागा चुनरी में दाग छिपाऊं कैसे, घर जाऊं कैसे… सुनाकर रूप कुमार ने बापू सहित अतिथियों का दिल जीत लिया।, मिराज सीएमडी पालीवाल, अतिथियों व श्रोताओं का दिल जीत लिया। इस दौरान रूप-सोनाली ने तबला, हारमोनियम पर आलाप किया।

ऐसी तान छेड़ी कि बापू भी मंद मंद मुस्कुराते हुए उन्हें दाद देते रहे। सोनाली ने जब अपनी खनकती आवाज का जादू लग जा गले फिर ये हसीन रात हो न हो… गीत पर बिखेरा तो ऐसा लगा कि यह रात खत्म न हो तथा रूप-सोनाली यूं ही रंग बिखेरते रहें।

संदेशे आते हैं…पर झूमे श्रोता

रूप के संदेशे पर लोग झूम उठे जब उन्होंने बॉर्डर फिल्म के संदेशे आते हैं, हमें तड़पाते हैं… सुनाया। रूप ने मन लागों मेरो यार फकीरी में सहित अन्य कई प्रस्तुतियां पेश कीं। सोनाली ने यारा सिली-सिली, बिरहा की रात का जलना सहित एक से बढ़कर एक गीत पेश किए।

सुरों संग बहते रहे श्रोता

लालबाग स्टेडियम में गुरुवार की शाम रूप कुमार राठौड़ और सोनाली की दिलकश प्रस्तुतियों के दौरान हजारों श्रोता सुरों संग-संग बहते रहे। दोनों कलाकारों की प्रस्तुतियों ने देर रात तक लोगों को मंत्र मुग्ध किए रखा। प्रस्तुति के दौरान कई लोग आंखें बंद किए सुर और संगीत की गहराई में गोते लगाते हुए नजर आए। कई प्रस्तुतियों पर लोग वाह-वाह कर उठे।

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