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कैलाश मानसरोवर यात्रा

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 कैलाश पर्वत

कैलाश पर्वत

कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और पार्वती निवास करते हैं, इसलिए यह अति पवित्र स्थान माना जाता है। इस स्थान को 12 ज्योतिर्लिगों की तरह श्रेष्ठ माना गया है। हर साल मानसरोवर यात्रा पर हजारों साधु-संत, श्रद्धालु जाते हैं। शिव पुराण के अनुसार स्वयं शिव जी ने कहा कि कैलाश वह स्थान है, जिसका कभी नाश नहीं होता है।
भगीरथ गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाए, तो शिव ने कैलाश पर ही गंगा जी को अपनी जटा में धारण किया। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने अपने ध्यान और सृष्टि की रचना आरंभ करने के लिए ही मानसरोवर का निर्माण किया था। शाक्त ग्रंथ के अनुसार देवी सती का दायां हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे यह झील तैयार हुई। उसी का रूप मानकर यहां एक शिला को पूजा जाता है। इसे 51 शक्तिपीठों में माना गया है।
कहते हैं कोई व्यक्ति मानसरोवर में एक बार डुबकी लगा ले, तो वह रुद्रलोक पहुंच जाता है। जो व्यक्ति मानसरोवर की धरती को छू लेता है, वह ब्रह्म-स्वर्ग में पहुंच जाता है और जो व्यक्ति इसका पानी पी लेता है, उसे भगवान शिव के बनाए स्वर्ग में जाने का अधिकार मिल जाता है। कैलाश पर्वत पर ही वैश्वेश्वर नामक स्थान है, जो धन के अधिपति कुबेर की महानगरी है। शास्त्रों में इसी स्थान को पृथ्वी के स्वर्ग की संज्ञा दी गई है। जैन धर्मालु कैलाश को अष्टपद कहते हैं।
कहा जाता है कि प्रथम र्तीथकर ऋषभदेव ने यहीं आध्यात्मिक ज्ञान, निर्वाण, प्राप्त किया था। जैनियों की मान्यता है कि आदिनाथ ऋषभ देव का यह निर्वाण स्थल कैलाश अष्टपद है। कहते हैं ऋषभ देव ने आठ पग में कैलाश की यात्रा की थी। तिब्बत के स्थानीय बोनपा लोग भी मानसरोवर झील को पवित्र मानते हैं। इस झील के तट पर कई मठ भी हैं।
क्या-क्या देखेंगे

मानसरोवर

मानसरोवर

गौरी कुंड : यहां स्थित ड्रोलमा नामक स्थान से नीचे गौरी कुंड है। यह मां गौरी का निवास है। पौराणिक कथानुसार पार्वती जी की आज्ञानुसार उनकी रक्षा के लिए बैठे गणोश जी से भगवान शिव की यहीं तकरार हुई थी। जब गणोश जी ने उन्हंे नहीं जाने दिया, तो क्रोधित होकर शिव ने उनका सिर काट दिया था। बाद में गणोश जी को जीवित करने के लिए शिव जी ने उन्हें हाथी का सिर लगाया था। गौरीकुंड हमेशा बर्फ से ढंका रहता है। यात्री इस कुंड के पवित्र जल में स्नान करते हैं। साढ़े सात किलोमीटर क्षेत्र में फैली 80 फुट गहरी इस झील में पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी।
राक्षस ताल : राक्षस ताल लगभग 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र, 84 किलोमीटर परिधि में फैला है तथा 150 फुट गहरा है। प्रचलित है कि राक्षसों के राजा रावण ने यहां पर शिव की आराधना की थी। इसलिए इसे राक्षस ताल या रावणहृद भी कहते हैं।
शक्तिपीठ : शाक्त ग्रंथ के अनुसार इस स्थान पर मां सती का एक हाथ गिरा था, जिसके बाद ही यह झील बनी, इसलिए यह स्थान देवी के प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
मेरु पर्वत : वराहपुराण के अनुसार कैलाश में ही मेरु पर्वत है, जो ब्रह्मांड की धुरी है। गीता में भगवान कृष्ण ने भी अजरुन से कहा है कि मैं पर्वतों में सुमेरु हूं, अत: यहां पहुंच कर सुमेरु पर्वत के दर्शन भी हो जाते हैं।
यात्रा के नियम :

तीर्थ यात्री की उम्र 18 से 70 वर्ष के मध्य होनी चाहिए। व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ होना चाहिए। क्योंकि यह यात्रा भूतल से लगभग 20,000 फीट की ऊंचाई तक होती है। इसका समय भी २७ दिन का है। वहां पर गर्मी के मौसम में भी अत्यधिक सर्दी होती है। इसके लिए यात्रा से पूर्व सरकार द्वारा स्वास्थ परीक्षण कराया जाता है
चयनित आवेदकों के दो परीक्षण दिल्ली में होंगे। और एक परीक्षण यात्रा शुरू होने के पांच दिन बाद गुंजी में होगा। इन परीक्षणों में पास होने के बाद ही आवेदक यात्रा के पात्र होंगे। शुल्क का भुगतान चयन के बाद करना होगा।

आवश्यक दस्तावेज :

घोषणा पत्र। दो फोटो। स्वास्थ्य संबंधी प्रमाण पत्र। पासपोर्ट की प्रतिलिपि और अन्य दस्तावेज जो कि भारत सरकार का विदेश मंत्रालय चाहता है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा
यात्रा खर्च :

भारत सरकार का विदेश मंत्रालय यह यात्रा कराता है। इस यात्रा में प्रति यात्री खर्च लगभग 75 हजार रुपए आता है। स्थिति के अनुसार खर्च में अंतर भी हो सकता है।
कैसे जाएं :

कैलाश पर्वत तक जाने के लिए दो रास्ते हैं। एक रास्ता भारत में उत्तराखंड से होकर गुजरता है, लेकिन यह रास्ता काफी मुश्किल है, क्योंकि इस रास्ते पैदल चलकर ही यात्रा पूरी हो पाती है। दूसरा रास्ता जो थोड़ा आसान है, वह है काठमांडू, नेपाल से होते हुए जाने का।
सड़क मार्ग :

दिल्ली से काठमांडू जाएंगे। वहां एक दिन रुक कर पशुपतिनाथ जी के दर्शन की योजना बना सकते हैं। काठमांडू से लगभग एक घंटे की यात्रा के बाद नेपाल-चीन की सीमा पर स्थित फ्रेंडशिप ब्रिज पर चीनी अधिकारी मानसरोवर यात्रियों की कस्टम क्लियरेंस और पासपोर्ट की जांच करते हैं। यात्रा का पहला पड़ाव ‘नायलम’ तिब्बत में होता है। यहां से गाड़ी द्वारा शाम तक सागा पहुंचेंगे। सागा से चौथे दिन यात्रा प्रयाग के लिए शुरू होगी। प्रयाग में रात बितानी पड़ती है। पांचवें दिन आप मानसरोवर झील पर होंगे, जहां होता है स्वर्ग का आभास।

वायु मार्ग :

पहले वायु मार्ग से काठमांडू, नेपाल पहुंचते हैं। काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट पहुंचकर वहां से हिलसा तक हेलीकॉप्टर द्वारा भी जा सकते हैं। मानसरोवर तक पहुंचने के लिए लैंडक्रूजर का भी प्रयोग कर सकते हैं। काठमांडू से ल्हासा के लिए चाइना एयर सेवा भी मिलती है, जहां से तिब्बत होते हुए, मानसरोवर जा सकते हैं।

- पं. के. के. शर्मा

(ज्योतिषविद् एवं ज्योतिष सलाहकार)

(photo curtsy: google image)

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