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‘दोस्त’ तो कृष्ण और द्रौपदी भी थे

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krishna

हमारी सामाजिक बीमारियों के पीछे वेस्टर्न कल्चर की छूत है या नहीं, यह सवाल दरअसल उतना बड़ा नहीं है, जितना कि अपने अहंकार को पोसने के लिए हमने बना दिया है। पश्चिम से हमने जो सीखा है और जिसका जिक्र मैंने पिछले पार्ट में किया, वह इससे बड़ी बात है, हालांकि हमें लगता है कि अगर हमने उसे तवज्जो दी, तो महानता का हमारा भ्रमजाल बिखर जाएगा। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे पास जो था (और वह बेमिसाल था), उसे हमने गंवा दिया। यूरोप में डार्क एज आया और लगा कि इंसानी तरक्की का पहिया टूट जाएगा, लेकिन ज्ञान और हौसले की जीत हुई। भारत में अंधेरे और उजाले के बीच इस कदर सीधी-सीधी जंग नहीं छिड़ी, लेकिन फिर भी एक तरह का अंधा दौर आता रहा, जब यहां बाहर से हमले हुए और इतना टकराव चला कि समाज में नेगेटिव फैक्टर जोर पकड़ते गए। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। मैं भारतीय सामाजिक इतिहास का जानकार नहीं हूं, लेकिन मेरा मानना है कि भारत अपने हिस्से की जंग या तो टालता रहा या ऐसी कोई कमजोरी थी, जिसने उसे मुकाबले का हौसला नहीं दिया। नतीजतन हमारे यहां अब तक ऐसी बीमारियां कायम रहीं, जिन्हें किसी सभ्य समाज में नहीं होना चाहिए था।

यह लेख कुछ ऐसी महिलाओं के बारे में है, जो हमारी कल्चरल हिस्ट्री की जानी-मानी शख्सियत हैं। एक बार फिर उनकी याद दिलाने का मकसद बस यह अंडरलाइन करना है कि कितने बदल गए हैं हम कि अपना ही अतीत हमें अजनबी लगता है। और महिलाओं का ही जिक्र क्यों? इसलिए कि महिलाओं की समाज में पोजिशन और उनके रोल से ही हमें उस समाज की नैतिक दशा, सोच और तरक्की का पता चलता है। ये मिसालें मेरी अपनी पसंद और समझ के हिसाब से हैं। हिस्ट्री की बेहतर जानकारी रखने वाले रीडर्स अपनी लिस्ट बना सकते हैं।

सबसे पहले जो नाम मुझे खींचते हैं, वे वैदिक युग की उन महिलाओं के हैं, जिन्होंने अपने ज्ञानी और दार्शनिक पुरुष साथियों से बराबरी की और हिंदू धर्म के सबसे बड़े ग्रंथों में जिनका योगदान दर्ज है- मैत्रेयी, गार्गी और लोपामुद्रा। मैत्रेयी याज्ञवल्क्य की पत्नी थीं और कहते हैं कि पहली पत्नी कात्यायनी की इजाजत लेकर उन्होंने यह विवाह इसलिए किया कि उन्हें ईश्वरीय ज्ञान की चाहत थी। जब याज्ञवल्क्य ने संसार त्यागना चाहा और अपनी पत्नियों के बीच संपत्ति का बंटवारा किया, तो मैत्रेयी ने सवाल किया, क्या इस संपदा से मुझे मोक्ष मिल जाएगा? और फिर दोनों में लंबा संवाद चला। गार्गी वह विद्वान महिला थीं, जिन्होंने राजा जनक के ब्रह्म यज्ञ में याज्ञवल्क्य के साथ शास्त्रार्थ किया और ईश्वर और अस्तित्व को लेकर अपने सवालों से उन महाज्ञानी के पसीने छुड़ा दिए।

यह है विद्वता के सबसे ऊंचे लेवल पर हजारों साल पहले महिलाओं के रुतबे की मिसाल। वह यकीनन अजब समाज होगा, जहां महिलाएं परम ज्ञानियों की बराबरी कर रही होंगी। लेकिन आजादी और बराबरी के दूसरे पहलू भी हमारी गाथाओं में दर्ज हो रहे थे। मसलन शकुंतला। कण्व ऋषि की इस बेटी ने जंगल में भटक रहे एक राजा (दुष्यंत) का प्यार मंजूर किया और गर्भवती हुई। बाद में कण्व को जब पता चला तो उन्होंने कोई ऐतराज नहीं जताया और राजा से मिलने चल पड़े। कहीं कोई विरोध नहीं, कोई गिल्ट नहीं। आज जिस प्यार के कसूर में अपने बेटे या बेटी को काट दिया जाता है, वह उस वक्त गंधर्व विवाह के नाम से शास्त्रों में इज्जत हासिल कर रहा था।

लेकिन एक और भी रिश्ता है, जिसे हारा समाज नामुमकिन समझता है, शक की नजर से देखता है और बर्दाश्त नहीं करता। वह है औरत और मर्द के बीच दोस्ती का रिश्ता। इसीलिए मुझे द्रौपदी की कहानी दिलचस्प लगती है। पांचाल नरेश की बेटी और पांडवों की पत्नी द्रौपदी की जिंदगी में अजब उलझनें थीं और दुख भी। वे एक साथ पांच भाइयों की पत्नी बनीं, जबकि उनका प्यार उनमें से एक- अर्जुन, के लिए था। प्रतापी पतियों ने उन्हें जुए में दांव पर लगा दिया और भरी सभा में उनके कपड़े उतारने की कोशिश हुई। बरसों जंगलों में भटकने, लड़ाई की पीड़ा झेलने और आखिर में हिमालय की बर्फ में गल जाने तक उन्होंने कई इम्तहान झेले। कौन था, जो इस सब के बीच उनका सहारा बना रहा, जिसे उन्होंने हमेशा पुकारा और जो मदद के लिए हर बार हाजिर रहा? कृष्ण। वह कृष्ण, जिनके बारे में कहा जाता है कि वह हजारों रानियों के पति थे और जिनके रसिक रूप की कहानी अमर हो चुकी है, वह द्रौपदी के सखा थे। दोस्ती की ऐसी मिसाल पूरी दुनिया में शायद ही कोई दूसरी हो।

और आखिर में रजिया सुल्तान का जिक्र करना जरूरी लगता है। इस्लाम में महिलाएं शासक हुई हैं, लेकिन उनमें से कई या तो महज नाम के लिए थीं या वे किसी के इंतजार में उस गद्दी पर टिकी हुई थीं। लिहाजा यह जानना वाकई हैरतअंगेज लगता है कि तेरहवीं सदी के शुरू में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने अपनी बेटी को अपना वारिस माना और पिता की मौत के बाद जब भाई नाकारा साबित हुआ तो विरासत वाकई रजिया को सौंप दी गई। दिल्ली सल्तनत की मालिक एक औरत बनी और उसने उसी हुनर, सख्ती और समझदारी से राज चलाया, जैसा कि किसी सुल्तान से उम्मीद की जाती है। वह बहुत कामयाब सुल्तान साबित हुईं।

इस लिस्ट पर एक बार नजर डालिए और सोचिए, वह अतीत हमारी आज की रवायतों में कितना सलामत है। मुमकिन है आपको कई पॉजिटिव मिसालें याद हो आएं और आप कहें, खामियां तो हर जमाने में होती हैं। लेकिन मेरा कहना है, जिस समाज ने आज से सैकड़ों और हजारों बरस पहले रोशनी के वे मुकाम पार कर लिए हों, उसे तो कुछ अलग ही होना चाहिए था। वहां खामियां खोजने में पसीने छूट जाने चाहिए थे।

भारत सचमुच सोने की चिड़िया हुआ करता था। अब आप समझ सकते हैं कि वह वैसा क्यों नहीं रहा?

- द्वारा,

संजय खाती

(जिंदगीनामा ब्लॉग से साभार )

 

TAGS: Lord krishna, dropadi, friends, love v/s friendship, mahabharat, janmashatami 2012, satsang live

One Comment

  1. Jayanti lal

    what a excellent history , this is the time for respect the women in INDIA for which they are entitle.

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