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क्या है ब्रह्मचर्य : गुरु माँ आनंद मूर्ति

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Guruma Anandmurti
ब्रह्मचर्य का अगर हम शाब्दिक अर्थ करें, वह है – जब ब्रह्म में रमण होता है, वह ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है – चेतना को उच्चतर क्षेत्र में ले जाने के लिए तुम कृतसंकल्प हो और उसके लिए तुम अपने लिए देह में ओज को, उर्जा को सुरक्षित रखते हो और इस उर्जा को उर्ध्वगामी करते हो।
स्त्री – पुरुष के शारीरिक व्यवहार न करने भर को ब्रह्मचर्य नहीं कहते। तंत्र विज्ञान में शिव ने उमा से कहा है की जिसके भीतर अस्तेय, ज्ञान और आत्मनिष्ठा है, वह रतिकार्य में रत होने पर भी ब्रह्मचारी है ।
श्रीराम ने वशिष्ठजी से यह बात पूछी थी कि गुरुदेव! एक तरफ़ तो कहा जाता है कि महादेव योगी हैं और दूसरी और यह भी कहते हैं कि महादेव अपनी पत्नी उमा के साथ काम – व्यवहार कर रहे थे, तो उनका काम – व्यवहार सैंकड़ों वर्षों तक चला। तो एक योगेश्वर कामेश्वर कैसे हो सकता है ?
वशिष्ठ जी ने अपने शिष्य, इस युवा ब्रह्मचारी राम से कहा कि राम! जिसका निश्चय ब्रह्म में है, ऐसे व्यक्ति को शरीर का कोई भी व्यवहार किंचित मात्र भी लिपायमान नहीं करता। इसका अर्थ यह हुआ कि कोई गृहस्थ जीवन को जी रहा हो, काम – व्यवहार भी रहा हो, उसके बाद भी ब्रह्मचारी है ।
ब्रह्मचर्य का अर्थ – बिन्दु की रक्षा करना। बिन्दु का अर्थ वीर्य नहीं है। बिन्दु का अर्थ है – ऐसा अमृत जो तुम्हारे बिन्दु विसर्ग से निकलता है। उस अमृत की सुरक्षा करना ही ब्रह्मचर्य है। लोगों ने इसका अर्थ ले लिया है – वीर्य की रक्षा करना। जो वीर्य को स्खलित नहीं होने दे, वह आदमी ब्रह्मचारी है। पर योग कहता है कि जिसने अपने बिन्दु की रक्षा की वही ब्रह्मचारी है । बिन्दु विसर्ग क्या है? आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में एक और चक्र है, जिसे कहते हैं – बिन्दु विसर्ग।
श्रीकृष्ण को एक बार गोपियों ने कहा कि दुर्वासाजी को भोजन करना चाहते हैं पर यमुना में बाढ़ आई हुई है। तो जाएँ कैसे ? श्रीकृष्ण ने कहा कि जाओ! जाकर यमुना से प्रार्थना करके कहो कि हे यमुना! अगर श्रीकृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमें मार्ग दे दो।
यह सुनकर गोपियाँ हंसने लगी कि तू और ब्रह्मचारी? राधासहित हम सब गोपियों के संग तेरा संजोग है, उसके बाद तू कहता है कि मैं ब्रह्मचारी?
श्रीकृष्ण ने कहा कि जो मैंने कहा सो करो! गोपियों ने जाकर यमुना को वैसा ही कह दिया और यमुना ने रास्ता दे दिया।
जब वापिस लौटीं तो सबने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे कृष्ण! यह तेरी माया समझ नहीं आई? तू जानता है और हम भी जानते हैं कि हमारा तुमसे श्रृंगार – रस का संबंध है। उसके बाद भी यमुना ने मार्ग कैसे दे दिया?
श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि तुम लोगों की भावना और प्रेम को स्वीकार करते हुए मेरा तुम लोगों से संजोग जरुर हुआ, परन्तु मेरे बिन्दु कि रक्षा हमेशा रही है।

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