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महावीर स्वामी : समता के सूत्रधार

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सत्य के सदन में अहिंसा के अवतरण का नाम है तीर्थकर महावीर स्वामी। अचौर्य के आचरण और अपरिग्रह के अनुकरण का नाम है महावीर स्वामी। अनेकान्तवाद के आकाश में उत्सर्ग की उड़ान का नाम है महावीर स्वामी। अवैर की अभिव्यक्ति और क्षमा की शक्ति का नाम है महावीर स्वामी। सहिष्णुता की सात्विकता और संयम के सामथ्र्य का नाम है महावीर स्वामी। सद्भाव से सरोकार और समता के सूत्रधार का नाम है महावीर स्वामी।Mahaveer Swami

समता के सूत्रधार के रूप में महावीर स्वामी का अनन्य योगदान रेखांकित करना ही इस आलेख का प्रतिपाद्य विषय है। इन पंक्तियों के लेखक का मत है कि महावीर स्वामी समता के सृजन और विषमता के विसर्जन का नाम है। उदाहरणार्थ नारी-उत्थान और महिला सशक्तिकरण की दृष्टि से वर्ष 2010 में जिस “महिला आरक्षण विधेयक” को चुनौतियों की चट्टानों, कठिनाई के कांटों और बाधाओं के बवंडरों से गुजरते हुए बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा था और जिसे पारित करने में राज्यसभा के सदस्यों के पसीने छूट गए थे। (हालांकि लोकसभा में अभी इस विधेयक का पारित होना शेष है और यहां भी इसके समक्ष परेशानियों के पर्वत खड़े किए जाएंगे) उस नारी उत्थान के सपने को धार्मिक दृष्टि से साकार करने के लिए तीर्थकर महावीर स्वामी ने आज से 2600 वर्ष पूर्व ही समता की अलख जगाकर, महिला सशक्तिकरण की नींव रखी दी थी।

यह नींव थी- महावीर स्वामी द्वारा श्रमण और श्रमणी, श्रावक और श्राविका इन चारों को लेकर-चतुर्विध संघ की स्थापना। तीर्थकर महावीर स्वामी ने कहा- जो जिस अधिकार का हो, वह उसी वर्ग में आकर समयक्त्व (सम्यक्त्व) पाने के लिए आगे बढ़े। जीवन का लक्ष्य है- समता पाना।

समता का यह भाव ही महावीर स्वामी के जीवन और दर्शन का उल्लेखनीय बिन्दु है। समत्व की साधना और क्षमत्व की आराधना ही महावीर स्वामी की चेतना और चिन्तन है। एक वाक्य में कहें तो महावीर स्वामी अहिंसा की आसन्दी से संयम की साधना करते हैं। अहिंसा की आसन्दी का अर्थ है : प्रेम और समत्व।

महावीर स्वामी की दृष्टि में क्षमत्व है, इसलिए वे प्राणी मात्र से प्रेम करते हैं। उनकी नीति में समत्व है, इसलिए वे स्त्री को पुरूष के समकक्ष समझते हैं। सम्यक दृष्टि, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र से संपन्न महावीर स्वामी इसी वजह से यानी समता-भाव के कारण ही चतुर्विध संघ में श्रमणी को वही स्थान देते हैं जो श्रमण का है और श्राविका को वही स्थान देते हैं, जो श्रावक का है।

यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि जब तीर्थकर महावीर स्वामी ने भिक्षुणी संघ की स्थापना की (यहां अभिप्राय साध्वी संघ से है), तो उसमें प्रत्येक वर्ग की çस्त्रयों को दीक्षा दी। एक और विशेष बात यह कि तीर्थकर महावीर स्वामी ने दासी-प्रथा का प्रबल विरोध किया। नारियों के क्रय-विक्रय को रोका। सत्य तो यह है कि महावीर स्वामी महिला सशक्तिकरण के संदेशवाहक और समता के सूत्रधार थे।
BY- अकाहर हाशमी
(प्राध्यापक व साहित्यकार)

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