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The Spiritual Touch

माँ! क्या कल भी रोई थी तुम

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माँ!
क्या कल भी निहार रही थी
तुम मेरी राह,
क्या कल भी रोई थी तुम
आश्रम की चारदीवारी से लग कर
फूट-फूट… जार जार!!
क्या कल भी तेरे हाथ मे था
तेरे चावल के चार दानों का प्रसाद
मेरे लिए??जिसे तू
पिछले आठ सालों से मुझे न दे पायी !
कल भी
तेरे बृद्धा आश्रम के माली ने तुझे डांटा
झिझोरा तुम्हे
और घसीट कर तेरे कमरे मे डाल दिया??
माँ!
मैं आज भी नहीं आऊंगा
व्यस्त हूँ
“माँ” शब्द पर व्याख्यान देने जाना है आज!!
जाहिल हैं माँ, तेरा माली
उसको नहीं पता
आज “ममता की देवी का दिन” है !!

- अमित आनंद

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Mother’s Day पर बहुत कुछ संजोया “ममतामयी माँ” के लिए…

“ममतामयी माँ”

“मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई” Munawwar Rana Poetry

हज़ारों दुखड़े सहती है माँ

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