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जहां तर्क है, वहां नर्क है : मुनि तरुणसागर

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जैन संत मुनिश्री तरूणसागर जी ने कहा– जीवन की मूलभूत समस्या अहंकार है और समर्पण उसका मूल समाधान है। अहमस्मि, ‘मैं हूं’, ‘आई एम समथिंग’, ‘मैं भी कुछ हूं’ – यह जो भाव है, सही संसार है। अहंकार अंधा है, अहंकार की आंखें नहीं होतीं। वह चल तो सकता है, लेकिन देख नहीं सकता। अहंकारियों की स्थिति अंधों जैसी होती है। उनके पास आंखें होती हैं, लेकिन फिर भी उन्हें दिखाई नहीं देता। पूरी लंका तबाह हो रही थी, लेकिन रावण को लंका व अपने खानदान का तबाह होना कहां दिख रहा था। कंस की आंखें थीं, लेकिन वह श्रीकृष्ण की शक्ति व सामथ्र्य को कहां देख सका। दुर्योधन आंखों वाला होकर भी क्या अंधा नहीं था? अहंकार जिस किसी की आत्मा पर भी सवार हो जाता है, वह आंख वाला अंधा माना जाता है। अहंकार जिस किसी की आत्मा पर भी सवार हो जाता है, वह आंख वाला अंधा माना जाता है। अहंकार से बचना, क्योंकि वह तुम्हारी आत्मा और परमात्मा के बीच में दीवार का काम करता है। आज जो तुम्हारे दाम्पत्य जीवन में, पारिवारिक व सामाजिक जीवन में संघर्ष, मनमुटाव, मनोमालिन्य दिख रहा है, उसका मूल कारण तुम्हारा अहंकार है। यदि पत्नी पति के प्रति, पति पत्नी के प्रति, बाप बेटे के प्रति, शिष्य गुरू के प्रति, गुरू शिष्य के प्रति समर्पण व सहयोग का रूख अपनाए तो जीवन में व्याप्त सारी विसंगतियां समाप्त हो जाए।
जहां तर्क है, वहां नर्क है : मुनि तरुणसागर ………………..
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मुनिश्री ने कहा कि जो सुख समर्पण में है, वह अकड़ने में नहीं है। जो अकड़ता है, यमराज (मौत) उसे जल्दी पकड़ता है। अहंकारी अल्पजीवी होता है, कभी ख्याल किया, तुम्हारे मुख में जो जीभ है, वह जन्म से आती है और मृत्यु तक साथ रहती है, लेकिन दांत जन्म के कई महीनों बाद आते हैं और बुढ़ापे में मृत्यु से पूर्व ही चले जाते हैं, टूट जाते हैं। इसका क्या कारण है? कारण स्पष्ट है– दांत कठोर होते हैं और कठोरता स्वयं के बिखराव का कारण है। जो कठोर होगा वह जल्दी मिटेगा। जीभ मृदु होती है और मृदुता अपने अस्तित्व के ठहराव का कारण है। जो मृदु होगा, उसे मौत कभी नहीं मिटाएगी। वह देर–सबेर मरेगा तो, लेकिन वह मर कर भी अमर हो जाएगा। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, क्राइस्ट– ये ऐसे महापुरुष हैं जो हमेशा समर्पण में जिए हैं और अहंकार की बू जिनके किसी व्यवहार से कभी नहीं आयी। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर के पास सब कुछ था, लेकिन उन्हें इस जड़ उपलब्धि पर कोई अहंकार नहीं था।

मुनिश्री ने कहा कि तुम्हारे पास है क्या, जो तुम इतना अकड़ते हो। चक्रवर्ती के चपरासी जैसी हैसियत भी तो तुम्हारी है नहीं। लेकिन तुम्हारा अहंकार तो चक्रवर्ती के अहंकार से भी बड़ा है। जैन ग्रंथों में उल्लेख है कि चक्रवर्ती भरत की गजशाला, अश्वशाला में 84 लाख हाथी थे और 18 करोड़ घोड़े थे। मैं तुमसे पूछता हूं– तुम्हारे पास कितने हाथी हैं? एक भी नहीं (सभा में से आवाज आयी)। खैर छोड़ों! हाथी बड़ी चीज है। घोड़े तो होंगे! चक्रवर्ती के पास तो 18 करोड़ घोड़े होते हैं। कितने घोड़े हैं तुम्हारे पास? एक भी नहीं (पुन: आवाज आयी)। खैर घोड़ों को भी छोड़ो। गधे तो होंगे ही (हंसी), कितने गधे हैं तुम्हारे पास? एक भी नहीं (पुन: आवाज और हंसी)। एक गधा तो घर पर है नहीं और अपने आप को चक्रवर्ती का बाप समझते हो। हद हो गई बेईमानी की! पता नहीं, तुम्हारा यह अहंकार तुम्हें कौन से रसातल में ले जाकर पटकेगा।

मुनिश्री ने विषय स्पष्टीकरण हेतु एक हिंदू पौराणिक कथा कही कि एक बार देव और असुरों में घमासान युद्ध हुआ। युद्ध में असुर जीते और देवता पराजित हो गए। पराजित इंद्र को स्वर्ग छोड़ना पड़ा। असुरों ने इंद्र की राजधानी अमरावती को ध्वस्त कर दिया। एक बार पुन: देवों और असुरों में युद्ध हुआ। इस बार देव विजयी रहे। इंद्र पुन: देवों सहित अपनी राजधानी लौट आया। राजधानी अमरावती तो खंडहर मात्र रह गई थी। इंद्र ने मय शिल्पी को अमरावती के नव–निर्माण की आज्ञा दी। मय ने अपनी सूझबूझ और अथक परिश्रम से इंद्र की मनचाही अमरावती बना दी। इसी बीच इंद्र को अहंकार आ गया कि मैं पहला और अंतिम इंद्र हूं, अत: मेरी राजधानी भी अपने आप में पहली और अंतिम राजधानी होनी चाहिए। अहंकार की गिरफ्त से ग्रसित इंद्र की कल्पना ने नई उड़ान भरी और मय को पुन: आदेश दिया कि इससे भी भव्य तथा सुंदर अमरावती होनी चाहिए। इसे मिटाकर पुन: नव–निर्माण करो। मय ने पुन: भव्यतम अमरावती का निर्माण किया, लेकिन इंद्र अब भी संतुष्ट नहीं था। उसने उससे भी अच्छे निर्माण की आज्ञा दी। तीन–चार बार ऐसा हुआ तो मय परेशान हो गया। थककर मय ने अपने गुरू विश्वकर्मा ब्रा जी से इसकी शिकायत की। ब्रा ने इंद्र को बुलाया। इंद्र आया तो ब्रा ने इंद्र को चिंवटों की रेंगती हुई एक धारा दिखाई और इंद्र से पूछा– क्या तुम जानते हो ये कौन हैं?
इंद्र ने कहा– नहीं, मुझे नहीं पता कि ये कौन हैं।
तब ब्रा ने कहा– हे इंद्र! तुम जिन चिंवटों को देख रहे हो, उनमें से प्रत्येक चिंवटा अपने किसी पूर्व जन्म में इंद्र रह चुका है। यह सुनकर इंद्र पानी–पानी हो गया, उसका अहंकार मोम की तरह उड़ गया, बफ‍र् की तरह गल गया।
और यही मैं तुमसे कहता हूं, तुम कभी अपनी उपलब्धियों पर अहंकार मत करना। उपलब्धियों का उपयोग करना गलत नहीं है, उन पर अहंकार करना गलत है।
इस दुनिया में एक से बढ़कर एक टाटा–बिड़ला–डालमिया पड़े हैं। तुम किस खेत की मूली हो, तुम्हारा अहंकार व्यर्थ है।
अहंकार और समर्पण में फर्क बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि अहंकार शून्य की ओर ले जाता है और समर्पण पूर्ण की ओर ले जाता है। तर्क नर्क है। समर्पण स्वर्ग है। अहंकार मृत्यु है और समर्पण मुक्ति है। अर्हम् को पाना है तो अहम् से मुक्ति आवश्यक है।

जैन मुनिश्री तरूणसागर जी ने जिनके प्रवचनों की धूम इस समय पूरी राजधानी में मची हुई है, आगे कहा कि क्रोध तात्कालिक पागलपन है। क्रोध अहंकार के पीछे चलता है। क्रोध औ अहंकार सगे भाई हैं। जिनसे तुम आदर की अपेक्षा करते हो यदि उनसे आदर नहीं मिलता तो तुम्हें क्रोध आ जाता है। जिनसे तुम प्रेम मांगते हो, प्रेम की, फूलों की आकांक्षा रखते हो, यदि वे घृणा और कांटे थमा देते हैं तो तुम क्रोधित हो जाते हो। अपेक्षा की उपेक्षा ही क्रोध है। जब–जब अपेक्षा की उपेक्षा होगी, तब–तब तुम्हें क्रोध अवश्य आएगा। इसलिए महावीर स्वामी कहते हैं कि किसी से सम्मान की, प्रेम की, फूलों की अपेक्षा ही मत रखों तो उपेक्षा कौन कर सकता है और जब उपेक्षा नहीं होगी तो क्रोध स्वत: ही नि:शेष हो जाएगा।

मुनिश्री ने सुझाव दिया कि जो काम आंखों के इशारे से हो सकता है, उसे हाथ के इशारे से कराना नादानी है और जो काम हाथ के इशारे से हो सकता हो, उसे मुख से बोलकर कराना नादानी है। जो काम धीरे से बोलकर हो सकता है, उसे क्रोध से चिल्लाकर कराना नादानी है। इसी प्रकार जो काम हल्के से क्रोध के अभिनय से हो सकता है, उसे अधिकार के बलबूते हल करना पागलपन नहीं तो फिर क्या है? और अभी तुम यही कर रहे हो, सारी दुनिया यही कर रही है। यही एकमात्र कारण है कि संसार में इतनी वैमनस्यता, बिखराव, संघर्ष, दु:ख पनप रहे हैं। किसी को जीतना है तो तलवार से नहीं, प्यार से जीतो, क्रोध से नहीं, क्षमा से जीतो। यदि सामने वाला उग्र– स्वभावी है, प्रचंड–प्रकृति है, यदि वह आग अनता है, आग का गोला बनता है तो तुम्हें पानी बन जाना चाहिए, क्योंकि पानी ही आग पर काबू पा सकता है। आग का समाधान जल है और क्रोध का समाधान क्षमा है। क्रोध का जवाब क्रोध से देना वैसा ही है जैसा कि तुम किसी बाजार से गुजर रहे हो और किसी गधे ने तुम्हें लात मार दी तो तुमने भी उसे लात मार दी। पर ख्याल रखना–लात का जवाब लात से गधा ही देता है, इंसान नहीं।

मुनिश्री ने, जिनके मंगल प्रवचन जामा मस्जिद के सामने चल रहे हैं, जिसमें मुस्लिम बंधु भी बड़ी संख्या में शरीक होते हैं, कुरान की चर्चा करते हुए कहा कि हजरत मुहम्मद पर कुरान, मक्का से दूर जंगल में एक गुफा, जिसे ‘गार–हिरा’ कहा जाता हैं, में उतरी थी। जब वे ध्यानमग्न थे, तब अल्लाह का एक फरिश्ता आया और उसने बताया कि अल्लाह ने तुम्हें नबी बनाया है। विश्व में जितने धर्म हैं, वे एक स्वर में कहते हैं कि परमात्मा को जिसने भी पाया है, ध्यान से पाया है। भगवान महावीर ने कैवल्य ध्यान से पाया, बुद्ध को बुद्धत्व ध्यान से घटित हुआ। जीसस ने ध्यान में उतरकर सूली को सेज बना लिया। परमात्मा को जिसने भी पाया है, ध्यान से ही पाया है। ध्यान ही वह सीढ़ी है जिस पर चढ़कर परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है।
उन्होंने पुरजोर शब्दों में प्रेरणा देते हुए कहा कि जीवन में यदि कुछ पाना है, कहीं पहुंचना है, आत्मा के आनंद की अनुभूति करनी है तो चौबीस में से कम से कम एक घंटा ध्यान करना चाहिए। यदि एक घंटा संभव न हो, तो कम से कम एक घड़ी घंटे (चौबीस मिनट) ध्यान जरुर करना चाहिए। और यदि एक घड़ी भी संभव न हो तो कम से कम एक ‘णमोकार मंत्र’ का जाप अवश्य करना चाहिए और यदि णमोकार मंत्र का जाप संभव न हो, तो ‘अरिहंत सिद्ध, अरिहंत सिद्ध’ इस मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए और यदि यह भी संभव न हो तो कम से कम ‘ऊँ–ऊँ’ इस मंत्र का जाप अवश्य अनिवार्य यप से करना चाहिए, और यदि यह भी संभव न हो तो फिर चुल्लू भर पानी में…। मैं क्यों कहूं, आप खुद समझ लें। (हंसी) मन तो मानसरोवर है। उसमें परमात्मा का अमृत भरा है, लेकिन उस अमृत का रसास्वादन ध्यान, सामायिक तथा समाधि के क्षणों में ही संभव है। जीवन में प्रतिदिन कुछ क्षण आतमचिंतन, परमात्म कीर्तन, स्वाध्याय के लिए हों, ताकि आपाधापी के इस व्यस्ततम युग में भी हम अपने से जुड़ सकें और जीवन को निखारने की कला सीख सकें।

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