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नवरात्रि: आज दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा

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नवदुर्गाओं में दूसरी दुर्गा का नाम ब्रहमचारिणी है। इनकी पूजा द्वितीया तिथि को की जाती है। ब्रहमचारिणी इस लोक के समस्त चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता हैं। इनका स्वरूप श्वेत वस्त्र में लिपटी हुई कन्या के रूप में है जिनके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल है। यह देवी अपने भक्तों को सर्वज्ञ सम्पन्न विद्या देकर विजयी बनाती हैं।

नवरात्र पर विशेष- दुर्गा के नौ रूप

Navratri Pooja, Customs, Aarti & All

देवी कवच / चण्डी कवच

51 पीठों में महापीठ : कामाख्या शक्तिपीठ

मराठा शक्ति पीठ: माँ तुलजा भवानी

जहाँ दीपक से काजल नहीं,केसर बनती है : आई माता

जिस मंदिर में पाकिस्तान के छक्के छूट गए : तनोट माता

चूहों वाली माता : करणी माता, देशनोक

कलयुग में शक्ति का अवतार माता जीण भवानी

ब्रह्मचारिणी से ब्रह्म का अर्थ है, तपस्या यानी तप का आचरण करने वाली भगवती। ब्रहमचारिणी का स्वरूप बहुत ही सादा और भव्य है। अन्य देवियों की तुलना में यह अति सौम्य, क्रोध रहित और तुरंत वरदान देने वाली देवी हैं। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएं हाथ में कमंडल रहता है। अपने पूर्व जन्म में ये राजा हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थी। भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए इन्होने घोर तपस्या की थी। माँ दुर्गा का यह दूसरा स्वरुप भक्तों और सिद्धों को अनन्त फल देने वाला कहा गया है। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है।

 

दधाना कपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रहमचारिण्यनुत्तमा।

 

देवी का द्वितीय स्वरूप ब्रहमचारिणी प्रतीक रूप में नवदुर्गाओं कीं दूसरी ऐसी अमोघ शक्ति है, जिसने 108 दुर्गाओं में अपने विभिन्न रूप लेकर इस संसार में महाविद्या और महाबल जैसे शास्त्र और शस्त्र का निर्माण किया जिस प्रकार देवताओं में ज्ञान और वेदों के निर्माण कर्ता ब्रहमा जी हैं ऐसे ही आज के युग में मंत्र शक्ति और रचना विधान का नाम ब्रहमचारिणी है। इसकी पूजा अर्चना द्वितीया तिथि के दौरान की जाती है। सचिदानन्दमय ब्रहमस्वरूप की प्राप्ति कराना आदि विद्याओं की ज्ञाता ब्रहमचारिणी इस लोक के समस्त चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता है। इसका स्वरूप स्वेत वस्त्र में लिप्टी हुई कन्या के रूप में है। जिसके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल विराजमान है। यह अक्षयमाला और कमंडल धारिणी ब्रहमचारिणी नामक दुर्गा शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र मंत्र आदि से संयुक्त है। अपने भक्तों को यह अपनी सर्वज्ञ सम्पन्न विद्या देकर विजयी बनाती है।

 

ओम् ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।।

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः

स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभांव ददासि।

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या

सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।।

सर्वमंगलमंगलये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि नमोऽतु ते।।

शरणांगतदीन आर्त परित्राण परायणे

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।।

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।

भयेभ्यारत्नाहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते।।

 

ब्रहमचारिणी का स्वरूप बहुत ही सादा और भव्य है। मात्र एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में चन्दन माला लिए हुए प्रसन्न मुद्रा में भक्तों को आशीर्वाद दे रही हैं। अन्य देवियों की तुलना में वह अतिसौम्य क्रोध रहित और तुरन्त वरदान देने वाली देवी हैं। नवरात्र के दूसरे दिन शाम के समय देवी के मंडपों में ब्रह्मचारिणी दुर्गा का स्वरूप बनाकर उसे सफेद वस्त्र पहनाकर हाथ में कमंडल और चंदन माला देने के बाद फल, फूल एवं धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करके आरती करने का विधान है।

 

स्तोत्र

तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्।

ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

नवचक्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्।

धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।

शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्।

 

कवच

त्रिपुरा में हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।

अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलो॥

पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशेपातुमहेश्वरी॥

षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।

अंग प्रत्यंग सतत पातुब्रह्मचारिणी॥

 

इन नवदुर्गाओं का वास्तविक व्यक्तित्व दुर्गा सप्तशती के देवी कवच में वर्णित है। जो इन्हें भक्तिपूर्वक स्मरण करता है ये उनका निश्चय ही उद्धार करती हैं। देव दानव युद्ध के दौरान इनका जो स्वरूप और सवारी का वर्णन है वह इस प्रकार है जैसे कि चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ़ होती है वाराही भैंसे पर सवारी करती है। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरूड़ पर ही आसन जमाती है। माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं। कौमारी का वाहन मयूर है। भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मीदेवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं। वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राहमी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं। इस प्रकार ये सभी माताएं सब प्रकार की योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत सी देवियां हैं जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं।

 

लेखक को जानें

पंडित केवल आनंद जोशी को वैदिक ज्योतिष शास्त्र, वास्तुशास्त्र, यंत्र, मंत्र, गणित, फलित और अर्घ्य शास्त्र का 35 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने कई सेमिनारों और ज्योतिष संस्थानों में व्याख्यान दिए हैं और टेलिविजन कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है। उन्होंने करीब 70 पुस्तकें लिखी हैं जिनमें प्रमुख हैं – आप और आपकी राशि, अंक विज्ञान, संपूर्ण वास्तु शास्त्र, संपूर्ण हस्तरेखा विज्ञान, भारतीय फलित ज्योतिष और कालसर्प दोष। कादंबिनी, दैनिक भास्कर, अमर उजाला और कई ज्योतिष पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित हुए हैं। जोशी जी नवभारत टाइम्स में नियमित रूप से दैनिक, साप्ताहिक और वार्षिक भविष्यफल लिखते हैं।

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