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The Spiritual Touch

“अद्भुत है ओशो के विचार “

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osho

रजनीश मुझे काफ़ी पहले से अच्छे लगते रहे हैं. उनके गुरुआई का मैं क़ायल रहा हूँ। नाक सीधे पकड़नी हो या घुमा के.. वो दोनों तरह से पकड़ने की महिमा गा कर आप को चकाचौंध कर सकने की प्रतिभा रखने वाले गुरु थे। कबीर को कबीर बन कर और नानक को नानक बनकर समझा सकने वाले गुरु रहे वो। बहुत ही पहुंचे हुए आदमी थे।
ये गोरी चमड़ी वाले लोग, जिन्होने डेढ़ सौ बरस राज किया हमारे ऊपर, को ओशो, अंग्रेज़ी के अपने निहायत देसी उच्चारण के बावजूद कुत्ता बनाकर रखते थे। इसे गाली न समझा जाय! कुत्ता जैसे स्वामी के आगे पीछे भक्ति भाव से डोलता है.. वैसे ही ये गोरे भी डोलते रहे।
अमरीका जा के भी डंका बजा आये थे.. पर जाने क्या साउंड बैरियर तोड़ दिया कि अमरीका वालो ने इनको टिकने ही नहीं दिया। कुछ लोगों का आरोप है कि वहाँ कि क्रिश्चियन लॉबी को इनका ‘नैतिक भ्रंश’ रास नहीं आया। कुछ लोगों का कहना है कि अमरीका से उनके निकाले जाने के पीछे अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और उनके पीछे पोप का दुराग्रह था। और वो सिर्फ़ अमरीका ही से नहीं निकाले गए.. पूरी दुनिया में वो जहाँ-जहाँ गए उन्हे विरोध का सामना करना पड़ा।
अमरीका से निकलने के बाद ओशो ने दुनिया की सैर करने का मन बनाया पर ग्रीस, स्वीडन, इंगलैंड, आयरलैंड, स्पेन, स्विटज़रलैंड, सेनेगल, उरुग्वे कहीं भी उन्हे जमने नहीं दिया गया। कुल मिलाकर सत्रह देशों से खदेड़े गए और कई जगह तो एयरपोर्ट से ही वापस लौटा दिया गया.. जैसे वो कोई प्लेग की बीमारी हों! ध्यान दिया जाय इन देशों में से कोई भी ‘मुस्लिम’ देश नहीं था.. लगभग सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश थे।
पहले तो ओरेगॉन की बिग मडी रान्च में बसे रजनीशपुरम को अवैध घोषित किया गया क्योंकि वहाँ धर्म को राज्य के साथ मिलाया जा रहा है.. ये वो देश कह रहा था जिसकी करेन्सी – हर डॉलर पर छपा रहता है – इन गॉड वी ट्रस्ट! हद है!
इस घटना के बाद जब ओशो की सचिव माँ आनन्द शीला के खिलाफ़ एक हत्या का मामला सामने आया तो पुलिस ने जाँच के बहाने ओशो को गिरफ़्तार करके बारह दिन तक अमरीका की छै जेलों की सैर कराई। उनके ऊपर तमाम क़ानूनों के अन्तर्गत चौंतीस केस बनाए गए.. और ये सब अवैध तरीके से। ओशो ने बिना प्रतिवाद किए अमरीका छोड़ देने का फ़ैसला किया। अमरीकी लोकतंत्र से उनकी आस्था उठ चुकी थी। उन्हे विश्वास हो चला था कि अमरीका ऐसे अपराधियों का देश है जो आज़ादी का मन्त्र का जाप करते हैं।
अमरीका जाने से पहले ओशो ने अपनी बेबाक ज़बान में भारत तथा उसकी संस्कृति को काफ़ी गरियाया था। क्योंकि पुणे में उनके आश्रम के खुले वातावरण और रजनीश के उकसाने वाले वक्तव्यों के चलते धार्मिक कट्टरपंथी उनसे खासे खफ़ा थे। पुणे में एक सभा के दौरान उन पर एक व्यक्ति ने चाकू से हमला भी किया। सरकार ने उनके आश्रम में आने वाले विदेशी भक्तों के ऊपर रोक-टोक लगाना शुरु कर दिया और आश्रम के ऊपर भी कुछ क़ानूनी दाँव-पेंच निकाले।
जिस से खफ़ा होकर ओशो ने दुनिया के ‘सबसे सुनहरे’ देश अमरीका की ओर रुख किया। पर वहाँ जो हाल हुआ उसने उनका दिल ही नहीं तोड़ दिया- बाद में उनके डॉक्टर ने भी ये भी आशंका व्यक्त की वहाँ पर दिए गए ज़हर ने ही उनकी जान ले ली। पर विडम्बना यह है कि आखिरकार ओशो को पुणे की धार्मिक संकीर्णता ने ही शरण दी। जिस को गरिया कर भागकर वो पश्चिम के खुलेपन में अपना आश्रम बनाने गए थे.. पर नहीं बना सके।
बताइये! ओशो की ही तरह हमारा पढ़ा-लिखा अंग्रेजी तबका अपने ऐसे देसी देशवासियों को दकियानूसी, पोंगापंथी और न जाने क्या-क्या बताता है.. और अमरीकी संस्कारों में नित नए रूपों में ढला जाता है। पर वो दकियानूसी-पोंगापंथी रजनीश को पचा जाता है.. पर अमरीकी लिबरलिज़्म अपने समाज की सहज नैतिकता का एक धार्मिक आवरण नहीं स्वीकार पाता। क्या पाखण्ड है भाई अमरीकी समाज का!
यहाँ यह याद दिला देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि रामकथा बखानने वाले मुरारी बापू भी ओशो का श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं और उन्हे महात्मा मानते हैं। साथ ही साथ यहाँ यह भी याद करा दूँ कि इस बात को किन्ही रामभक्तों की शुद्ध आपराधिक साम्प्रदायिकता का अनुमोदन न समझा जाय! वो हमारे समाज का एक अपना फोड़ा है।
(साभार- निर्मल आनंद )

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ओशो द्वारा दिए गए विभिन्न अमृत प्रवचनों का संकलन..

विपस्‍सना ध्‍यान की तीन विधियां: ओशो

ओशो: सेक्‍स से मुक्‍ति संभव ?

सेक्‍स तो आमोद-प्रमोद पूर्ण होना चाहिए

सेक्‍स नैतिक या अनैतिक ?

खजुराहो– आध्‍यात्‍मिक सेक्‍स (ओशो की पुस्तक “सम्भोग से समाधी की ओर” से)

धन-शक्‍ति का संचित रूप है: ओशो

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