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रामकथा के अन्तर्पाठ पर चिंतन

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भारतीय सनातन वैदिक धर्म में ईश्वर के संदर्भ में एक अनूठी अवधारणा है-अवतार की. विश्व की तमाम शेष मान्यताओं से अलग यहां स्वयं विष्णु ही धरती पर अवतरित होते हैं- कभी मत्स्य के रूप में तो कभी कच्छप के रूप में. कभी वाराह तो कभी आधा पशु-आधा मानव यानी नृसिंह के रूप में. यूं देखा जाए तो यह अवतार-सारणि सृष्टि के विकास का एक स्थूल सा मानचित्र प्रस्तुत कर देती है.
Ramkatha
अवतारों की इस श्रृंखला में राम और कृष्ण भारतीय जनमानस में इस तरह और इस हद तक रच बस गये हैं कि अपनी भारत-भूमि को रामकृष्ण की भूमि ही कहा जाने लगा. राम और कृष्ण की तुलना का प्रश्न नहीं है, फिर भी वास्तविकता यह है कि लोक-गीतों और लोक-कथाओं में राम की जिस परिणाम में उपस्थिति दिखायी देती है वैसी अन्य अवतारों की तो क्या कृष्ण की भी नहीं है. कारण संभवत: यही है कि ‘राम’ परिवारी हैं- जन्म से लेकर वनवास से वापस आकर राज्य संभालने और प्रजा-पालन की कथा स्पष्ट रूप से आमजन के मन-मस्तिष्क में छपी हुई है.

राम कथा तो हर भाषा में सैकड़ों रचनाकारों ने अपने-अपने ढंग से कहीं लेकिन न्यूनाधिक भिन्नता के बावजूद उसमें ख्यात एकरूपता भी विद्यमान है- वृद्ध दशरथ का नि:संतान होना, पुत्रेष्ठि यज्ञ से राम तथा अन्य तीनों भाइयों का जन्म, विश्वामित्र का राम-लक्ष्मण को ताड़का, खर-दूषण इत्यादि राक्षसों के संहार के लिए ले जाना, धनुष तोड़कर जन की बेटी जानकी से विवाह, युवराज बनते ही विमाता द्वारा वन जाने की आज्ञा, वन में रावण द्वारा सीता का अपहरण, हनुमान जी से मित्रता, रावण के भाई विभीषण का राम की शरण में आना, राम द्वारा रावण को युद्ध में मार सीता के साथ वापस अयोध्या आकर राम राज्य की स्थापना – रामकथा की इस स्थूल रूपरेखा में भाषा-संस्कृति स्थानीय लोक रुचि, लोक व्यवहार और रचनाकार की दृष्टि से कुछ अंतर भी मिलते हैं लेकिन मोटे तौर पर राम कथा यही है.

राम की इस कथा में ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहाए गए राम के जीवन के तीन ऐसे प्रसंग हैं जिन पर बहुधा उंगली उठायी जाती है.

एक छिपकर बालि का वध करना, दूसरा साधना कर रहे शंबूक का वध करना और तीसरा गर्भवती सीता को धोबी के दुर्वचनों के कारण निर्वासित करना. बालि-वध तो मुख्य कथा का अंश है किन्तु शेष दोनों गोस्वामी तुलसीदास जैसे रचनाकारों की रचनाओं से अनुपस्थित हैं. राम ने सुग्रीव के बड़े भाई बाली का छिप कर वध किया. यह तो ठीक है, लेकिन उंगली उठाने वाले क्यों किया- इस पर विचार नहीं करना चाहते. राम केवल अपने बल के परम अहंकारी बालि को मारना चाहते थे जो किंचित जड़-मूढ़ भी था. जिसने अपने अनुज सुग्रीव की बात सुने बिना ही उस पर अविश्वास कर उसकी पत्नी को अपने पास रख उसे राज्य से निकाल दिया था. वे केवल उसी बालि का अंत चाहते थे.

वह समूचे किष्किंधा को कुरुक्षेत्र का मैदान नहीं बनाना चाहते थे जिसमें बालि के आतंक और आदेश से हजारों नागरिक युद्ध की भेंट चढ़ जाते. इसीलिए उन्होंने बालि को मार सुग्रीव को राजसिंहासन पर बैठाकर युवराज पद बालि के बेटे अंगद को दिया. बालि की मूढ़ता में किष्किंधा का आमजन भागीदार नहीं था इसलिए उन पर युद्ध थोपना मर्यादा पुरुषोत्तम को कतई स्वीकार्य नहीं था. छिपकर मारने के पीछे का तात्पर्य यही है कि आमने-सामने की लड़ाई होती तो सेना के हजारों निरपराध सैनिक बेवजह मारे जाते. युद्ध की विभीषिका से किष्किंधा प्रदेश को बचाने के लिए ही राम ने बालि को छिपकर मारने का लोकोपवाद स्वीकार करना श्रेयस्कर समझा. कृष्ण ने तो सत्य, न्याय और धर्म की रक्षा के लिए कई बार ऐसे लोकापवादों को ‘कुटिलता’ कहे जाने की सीमा तक स्वीकार किया है.

दूसरा प्रसंग वाममार्गी तांत्रिक साधना करने वाले शंबूक है जिसकी साधना में एक ब्राहृण पुत्र की मृत्यु हो जाती है. कथा का सपाट पाठ तो इसकी जातिवादी और वर्ण-व्यवस्था को प्रतिष्ठित करने वाला ही होगा लेकिन कथा के अन्तर्पाठ को भी जरा समझने की आवश्यकता है. शंबूक जाति से नहीं, बलि चढ़ाने वाला तांत्रिक होने के कारण ही शूद्र है. इस प्रकार की तांत्रिक साधनाएं तो भारतीय समाज में पुरातन काल से लेकर आज तक खूब प्रचलित रही हैं परंतु न तो इन साधनाओं को और न ऐसी तांत्रिकों को कभी सामाजिक-सार्वजनिक प्रतिष्ठा या सम्मान मिला. किसी भी न्यायप्रिय समाज में साधना तब तक ही वैयक्तिक प्रश्न हो सकता है जब तक वह किसी अन्य को हानि न पहुंचाए.

किसी की जान लेने वाली साधना के लिए किसी भी राजा से वही अपेक्षा होगी जो राम ने किया. शक्तिशील और सौंदर्य के पुंज श्रीराम का तो वैसे भी कोई कार्य आवेश या प्रतिक्रिया में नहीं हुआ. कथा के तात्पर्य ‘चरित्र’ को समग्रता में समझने पर ही समझे जा सकते हैं और जानने चाहिए, अन्यथा संदर्भ, परिस्थितयां और देश-काल से निरपेक्ष होकर तो कैसा भी अर्थ का अनर्थ किया जा सकता है. जिस राज्य में राजा, राजा की पत्नी और राजा के भाई के लिए भी वही कानून हो जो आम नागरिक के लिए है, वहां ब्राहृण होने मात्र से किसी को कुछ भी करने की छूट नहीं मिलती. राजतंत्रों में यूं भी वर्ण-भेद से ज्यादा वर्ग-भेद मजबूत रहे हैं.

तीसरा प्रसंग राम के राजा बनने के पश्चात सीता-निर्वासन का है. कथा-प्रसंग है कि राम के राज्य में किसी धोबी ने सीता के विषय में कुछ ऐसे दुर्वचन कहे कि राज्य की न्याय-प्रणाली के अनुसार राम को सीता-त्याग करना चाहिए था. धोबी का अपनी पत्नी से कुछ ऐसा ही कहना था कि रानी के लिए नियमों को ताक पर रखा जा सकता है लेकिन तेरे लिए नहीं. राम तक बात पहुंचने पर राम ने महारानी सीता के लिए राज्य के संविधान में संशोधन नहीं किया बल्कि नियमानुसार ही व्यवस्था दी. जहां यह प्रसंग है, वहीं यह भी है कि सीता के त्याग के उपरांत दूसरा विवाह तो क्या, राम के चेहरे पर मुस्कुराहट तक नहीं देखी गयी.

राजा का व्यक्तिगत सुख-खुशी कुछ नहीं होती. वह ऐसा महत्तर दायित्व है जिसे लेने के बाद  ‘निजता’ का कोई अर्थ नहीं होता. राजतंत्र में भी यह किसी बड़े से बड़े लोकतंत्र की पराकाष्ठा है कि समाज का अंतिम आदमी तक राजा की व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लगा सकता है, अन्यथा इतिहास में तो तमाम राजाओं की शूरवीरता और चक्रवर्तीपन कन्याओं को बलात उठा लाने और रानियों की संख्या के हिसाब से ही तय होता है. राम के सीता निर्वासन का यह पाठ न किसी प्रकार से अगर-मगर वाला रक्षात्मक है, और न ही क्षेपकों की दुहाई वाला. राम जितने बेहतर पुत्र थे, जितने बेहतर भाई थे उतने ही बेहतर पति भी थे, लेकिन वे उतने ही बेहतर राजा भी थे. जिस भवभूति ने सीता की इस करुण कथा को उत्तररामचरित में लिखा, उसी में राम का सीता के प्रति आत्यन्तिक स्नेह भी है.

ये वही राम हैं जो वन में पत्नी जानकी के पैरों से घंटों तक आंसू बहाते हुए कांटे निकालते हैं. उनका दर्द है कि जनक दुलारी राजकुमारी को विवाह के पश्चात मैं क्या जरा सा भी सुख दे पाया. राम की इस मनोस्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हजारों वर्ष बाद आज भी मिथिला के लोग अपनी बेटियों का विवाह अयोध्या में नहीं करते, क्योंकि उनकी दुलारी जानकी को अयोध्या की महारानी बनने पर भी दुख ही दुख झेलने पड़े. यहां तक कि समूचे मिथिला प्रदेश में मंदिर में विराजते तो राम-जानकी दोनों हैं लेकिन वे राम मंदिर नहीं बल्कि जानकी मंदिर ही कहे जाते हैं. आज नवमी तिथि मधुमास पुनीता वाली राम नवमी के दिन रामकथा के इस पाठ को भी समझने का यत्न होना चाहिए.

(BY- अवनिजेश अवस्थी)

One Comment

  1. Yash

    भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी . हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी .

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