SatsangLive

The Spiritual Touch

Sai Leela: गेरू लाओ, आज भगवा वस्त्र रंगेंगे

0

नासिक में एक ब्राह्मण थे, नाम था मुले शास्त्री। उन्होंने आधा दर्जन शास्त्रों का अध्ययन किया था। ज्योतिष एवं सामुद्रिक शास्त्र में वह पारंगत थे। एक बार वह नागुपर के प्रसिद्ध करोड़पति बापू साहेग बूटी से भेंट करने के बाद अन्य सज्जनों के साथ बाबा के दर्शन करने मस्जिद में गए। बाबा ने फल बेचने वाले से अनेक प्रकार के फल और अन्य पदार्थ खरीदे और मस्जिद में उपस्थित लोगों में उन्हें वितरित कर दिया। बाबा आम को इतनी चतुराई से चारों ओर से दबा देते थे कि चूसते ही संपूर्ण रस मुंह में आ जाता और गुठली एवं छिलका तुरंत फेंक दिया जा सकता था। बाबा ने केले छीलकर भक्तों में बांट दिए और उनके छिलके अपने लिए रख लिए। हस्तरेखा विशारद होने के नाते मुले शास्त्री ने बाबा के हाथ की परीक्षा करने की प्रार्थना की, परंतु बाबा ने उनSai Leelaकी प्रार्थना पर कोई ध्यान न देकर उन्हें चार केले दिए। इसके बाद सब लोग बाड़े पर लौट आए। अब मुले शास्त्री ने स्नान किया और पवित्र वस्त्र धारण करके अग्निहोत्र आदि में जुट गए। बाबा भी अपने नियमानुसार लेंडी को रवाना हो गए। जाते–जाते उन्होंने कहा कि कुछ गेरू लाना, आज भगवा वस्त्र रंगेंगे। बाबा के शब्दों का अभिप्राय किसी की समझ में नहीं आया। कुछ समय के बाद बाबा लौटे। अब मध्यान्ह बेला की आरती की तैयारियां प्रारंभ हो गई थी। बापू साहेब जोग ने मुले से आरती में साथ देने के लिए पूछा। उन्होंने उत्तर दिया कि वह संध्या के समय बाबा के दर्शनों को जाएंगे। तब जोग अकेले ही चले गए।

बाबा के आसान ग्रहण करते ही भक्तों ने उनकी पूजा की। अब आरती प्रारंभ हो गई। बाबा ने कहा, उस नए ब्राह्मण से कुछ दक्षिणा लाओ। बूटी स्वयं दक्षिणा लेने के लिए गए और उन्होंने बाबा का संदेश मुले शास्त्री को सुनाया। मुले बुरी तरह घबरा गए। वह सोचने लगे कि मैं तो एक अग्निहोत्री ब्राह्मण हूं, ऐसे में मेरे द्वारा उन्हें दक्षिणा देना क्या उचित है? माना कि बाबा महान संत हैं, परंतु मैं तो उनका शिष्य नहीं हूं। फिर मुले खुद को शुद्ध–पवित्र और मस्जिद को अशुद्ध–अपवित्र मानकर कुछ अंतर से खड़े हो गए और उन्होंने दूर से ही हाथ जोड़कर बाबा के ऊपर पुष्प फेंके। एकाएक उन्होंने देखा कि बाबा के आसन पर उनके कैलाशवासी गुरु घोलप स्वामी विराजमान है। अपने गुरु को वहां देखकर उन्हें महान आश्चर्य हुआ। कहीं यह स्वप्न तो नहीं है? नहीं, नहीं, यह स्वप्न नहीं है। मैं तो पूर्ण जागृत हूं, परंतु मेरे गुरु महाराज यहां कैसे आ पहुंचे? कुछ समय तक उनके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला। उन्होंने खुद को चिकोटी भी काटी और फिर विचार किया, परंतु वह निर्णय न कर सके कि कैलाशवासी घोलप स्वामी मस्जिद में कैसे आ पहुंचे। फिर सब संदेह दूर करके वह आगे बढ़े और गुरु के चरणों  में गिर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। दूसरे भक्त तो बाबा की आरती गा रहे थे, परंतु मुले शास्त्री अपने गुरु का नाम ले रहे थे। एक बार फिर वह जाति का अहंकहार और पवित्रता–अपवित्रता की कल्पना त्याग कर गुरु के श्रीचरणों में गिर पड़े। उन्होंने आंखें मूंद ली, परंतु खड़े होकर जब उन्होंने आंखे खोलीं तो बाबा को दक्षिणा मांगते हुए देखा। बाबा को आनंद स्वरूप और उनकी अनिर्वचनीय शक्ति देखकर मुले शास्त्री के आश्यर्च का ठिकाना न रहा। उनकी आंखें अश्रुपूरित होते हुए भी प्रसन्नता से नाच रही थी। उन्होंने बाबा को पुन: नमस्कार किया और दक्षिणा दी। वह कहने लगे कि मेरे सब संशय दूर हो गए। आज मुझे अपने गुरु के दर्शन हुए। बाबा की यह अद्भुत लीला देखकर सारे भक्त दंग रह गए। गेरू लाओ, आज भगवा वस्त्र रंगेंगे, बाबा के इन शब्दों का अर्थ अब सबकी समझ में आ गया था।

So, what do you think ?