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सर्वान्गयोग (सम्पूर्ण अष्ट अध्याय ): परमहंस स्वामी अच्युतानंद सरस्वती

सर्वान्गयोग
अध्याय प्रथम …
श्री गुरु के पदों को दंडवत है प्रेम से !यही प्रेम रहे स्थाई कृपा दृष्टी वही मिले!!१!!
आचार करके ऐसा सनातन मुमुक्षु ने* !किया प्रश्न गुरु बोले सिद्धांत सब वो सुनो!!२!!
मैंने श्रुति स्मृति शाश्त्र पुरानादिक है पढ़े !यथा विधान कर्मो को इनके करके लाखा  !!३!!
तो भी चंचलता मेरे मन की मिटती नहीं !समाधान नहीं स्थाई वो कैसे मुझको मिले !!४!!
कहे तत श्रुति वो क्या ?क्या है त्वं?रहता कहा? असी कहा जिसे वो क्या?ध्यान में बैठता नहीं !!५!!
देखना उसको कैसे ?जो देखे वह कोन है ? जानना चाहता हु यथार्थ मुझको कहें !!६!!
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* आत्म प्राप्ति में गुरु प्रत्यक्ष दर्शी और शिष्य सात्विक श्रधावान होना चाहिए!
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(यहाँ मोक्षेक्षा  “दर्शन योग” नामक पहला अध्याय सम्पूर्ण हुआ )

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अध्याय द्वितीय .
यह प्रश्न मुमुक्षु का सुन के श्री गुरु कहें ! लक्ष्य सिधांत का जो सो निश्च्यार्थ स्वरूप का !!१!!
यही  विज्ञानं की रीति साक्षात्कार स्वरुप का !इसी का बोध होने से दृढ निश्चय है मिले !!२!!
जड़ चैतन्य की ग्रंथि छुटने का सुमार्ग है ये ! बतासे अपने सामने रखना भूलना नहीं !!३!!
फिर वे सुक्षम्दृष्टि से देखना बोध के लिए ! हिये में बोध होते ही मुक्ति है भ्रमजाल से !!४!!
(यहाँ “गुरु स्थापन योग” नामक अध्याय दूसरा समूर्ण हुआ )

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अध्याय  तृतीय .
स्वरुप वस्तु का देखो देखा सो क्षर जानना ! भरी है मध्य में इसके$क्षर ब्रहम मिठास वो !!१!!
नाम शक्कर जो है वो पुरुषोत्तम भाव है ! प्रेम का निज स्थान ध्यान के हेतु से कहा !!२!!
यथार्थ बोध होने को निज मूल स्वरुप का ! वस्तु में त्रिपुटी* देखी कल्पना से स्वाभाव ने!!३!!
इन्द्रियों से दीखता है क्षरसो  तत है कहा ! त्वं से अक्षर को जाना असि निश्चय नाम है !!४!!
क्षर में अंग है आठ अक्षर एक अरूप है ! जहाँ है भावना दोनों की लय स्थान वस्तु सो !!५!!
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* यद्यपि परमात्मस्वरूप एक ही है , तथापि यह एक शून्य रूप नहीं परमात्मा ने ही आत्म सुख के लिए कल्पना द्वारा रचना करके निज शारीर में भेद जाना एवं ज्ञाता -ज्ञान- ज्ञेय इत्यादि सब त्रिपुटिया कल्पना मात्र है ! त्रिपुटी शब्द से सम्पूर्ण विश्व रूप का बोध किया है , बिना क्षर भाव के प्रत्यक्ष हुए अक्षर और पुरुषोतम भाव की कल्पना नहीं की जासकती ! तत्वमसि समझाने में जीवत्व भाव पृथक रहने वाली कल्पना नहीं रहती विश्व रूप ही रहता है ! पृथक माना हुआ भाव न रहने के हेतु यह वर्णन है वस्तु लक्ष्य में नहीं !
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( यहाँ “सद्गुरु स्थान दर्शन योग” नामक अध्याय तीसरा सम्पूर्ण हुआ )
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अध्याय चतुर्थ..
अब यह ध्यान में बैठे सम्पूर्ण इस हेतु से ! आदि में क्षर का भाव भाव देखना निज बुद्धि से !!१!!
दिखेगे इसमें भाव आठ भिन्न प्रकार के ! ये रूपांतर पाते है चक्राकार सदैव ही !!२!!
अपनी आखो से देखो दीखता है पदार्थ ये ! ऐसे ही विश्व में सारे रूप का दिखना है भरा !!३!!
इसे हाथ लगा देखो आता है स्पर्श ध्यान में ! ये स्पर्श भाव सर्वत्र विश्व में है भरा हुआ !!४!!
इसमें शब्द है स्थायी बजा के कान से सुनो !वैसे ही विश्व में सारे स्थित है शब्द भाव भी !!५!!
जीभ से लगा देखो वास्तु में कुछ स्वाद है ! ऐसे ही विश्व में है भी रस भाव भरा हुआ !!६!!
नाक से सूंघकर देखो इसमें गंध है भरा ! इसी रीति लखो सारे द्रश्य में गंध है रमा  !!७!!
यहाँ लो पञ्च तत्वों का सूक्ष्म भेद लखा दिया! इसीमें पांच का ब्योरा पंचिकर्ण आचुका !!८!!
रचना शब्द की सारी पांचो को बतला रही !गुण है इनके आगे वें तीनो सूक्ष्म रूप है !!९!!
पांचो ज्ञानेन्द्रियो से वे दिखने के नहीं कभी ! जानेगा मन वें तीनो और उनके स्वधर्म को !!१०!!
( यहाँ क्षर भाव स्थित “पंचीकर्नानुभव योग” नामक चौथा अध्याय सम्पूर्ण हुआ )

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अध्याय पंचम..
घी से लगा देखो वस्तु में गुण सत्व है ! सम्पूर्ण विश्व में भी है ऐसे ही ये भरा हुआ !!१!!
जल के साथ पिने से वस्तु में गुण है रजो !ये प्रत्यक्ष दिखेगा वैसे ही स्थित विश्व में !!२!!
अकेली वस्तु खाने से दिखेगा तम है भरा! इसी रीति रहे तीनो गुण सम्पूर्ण विश्व में !!3 !!
जीवो में अन्न के द्वारा ये तीनो स्थूल रूप से  ! कफ वात बने पित्त वेग से कूदने लगे !!४!!
इस से स्थूलता पायी स्वरुप बोध के लिए ! मन बुद्धि अहंकार बन के कार्य है करैं !!५!!
ऐसे ही आठ अंग स्थित है क्षर भाव में ! इसी ही को साम्यावस्था गुणों की संख्या ने कही !!६!!
अखंड मंडलाकार क्षररूप* फिरा करें! सम्पूर्ण विश्व की लीला इसीमे हो रही सदा !!७!!
यही  तत-पद है द्रश्य विराट इसी नाम से ! सबो को दीखता है ये प्रत्यक्ष जानते नहीं !!८!!
(यहाँ “क्षर विराट दर्शन नामक योग ” सम्पूर्ण हुआ )
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* क्षर भाव पुरुषोत्तम का सगुण स्वरुप है और गुणों की कार्य शक्ति पृकृति से होती है गुणों का चक्र घूमते ही उसमे तीन गुणों की चौथी  संधि करनी पड़ती है ! इसी में चार योनी  चार वर्ण चार अवस्था  चार वाणी आदि का निर्माण हुआ! नर नारायण इत्यादि !
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अध्याय षष्ठ:..
अब अक्षर आत्मा जानने की सुरीति ये! लखते है इसे लेना श्रद्धा सें सात्विकी हिये !!१!!
सम्पूर्ण vis हव की लीला क्षर में जैसे हो रही ! उसमें जो बैठी होगी अस्ति भांति प्रियत्व सें !!२!!
वेदों की नेति का शेष वस्तु की उपलब्धि वो ! उसी का भास सर्वत्र हो रह द्रश्य मात्र में !!३!!
वो मिठास यही आत्मा है निराकार जानना !वस्तु के स्वाद में भी वो भरी है प्रिय रूप सें !!४!!
मिठास को हुई इच्छा देखू निज रूप को ! तो क्या देख सकती नेत्रों सें निज रूप को ?!!५!!
होते ही वृति नेत्रों से देखना निज रूप तो ! दिखेगा यें विश्व सारा यही इसका स्वरुप है !!६!!
बुद्धि के बल से होवे अस्तित्व सिद्ध वस्तु का !आँखों से देखना चाहे दिखेगा विश्व रूप ही !!७!!
शब्द,स्पर्श तथा रूप रस गंध गुण त्रय !आंठो का जो लय स्थान सम्य्वस्था जिसे कहें !!८!!
उसी में जो रहे स्थाई अभिन्न गर्भ रूप से ! ज्ञानियों को भासती है साक्षित्व भाव सें वही !!९!!
यही इश्वर संज्ञा से अक्षर रूप स्वरुप में ! नित्य शुद्ध अज स्थाई स्थित साक्षी भाव सें !!१०!!
सर्व शक्ति इसीमे है ज्ञानी का ध्येय है यही! कर्मारंभ जताने का संज्ञार्थ ॐ कहें श्रुति !!११!!
(यहाँ “अक्षरानुभव ” नामक अध्याय छटवां सम्पूर्ण हुआ )

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अध्याय सप्तम ..
नाम है उसके आगे जानके बुद्धि ही जहाँ !लय को प्राप्त होती है वाही सदरूप जानना !!१!!
वही है अपना रूप पुरुषोत्तम भाव सें ! महिमा सदगुरु की ये निज बोधार्थ है कही !!२!!
अष्टांग क्षर साकार नहीं रूप मिठास में ! ये दोनों भावना छोडो अकेला नाम ही रहा !!३!!
वही शक्कर ये नाम पुरुषोत्तम भाव है ! क्षर – अक्षर दोनों की नहीं है भावना वहन !!४!!
द्रश्य साकार वही निराकार भी वही ! दोनों का धाम भी है वो उसको सर्व है कहा !!५!!
एक ही वस्तु में जानो कल्पित भाव तीन ये ! निज रूप लखाने को वेदों में कल्पना है किये !!६!!
बुद्धि में स्थित होवे ये मई ही सम्पूर्ण वुश्व हूँ ! अकन्म्प धरना बैठी गया द्वेत समाधी सो !!७!!
समाधी  की अवस्था यें अखंड रहने लगे ! अनन्यता* मिली वेदों का सार भी मिला !!८!!
(यहाँ “पुरुषोत्तमयोग” नामक अध्याय सातवाँ सम्पूर्ण हुआ )
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* अस्ति रूप सतनाम है , जह तह लख में आय ! अस्निश्चय जिनके हिये , वे अनन्य पद पाए !!
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अध्याय अष्टम.
पश्चात बिज भक्ति  का अनन्य बढ़ने लगे ! अकर्म रूप से दिखे विश्व में वो सदैव ही !!१!!
ये परा भक्ति है श्रेष्ठ  मुक्तो  का निज धाम यें ! सम्पूर्ण वृतियों का है एक ही लय स्थान ये !!२!!
इसीमे स्थित होने सें रस एक अकंप वो! हुआ मदरूप ही जानो जन्म-म्रत्यु उसे नहीं !!३!!
सर्वान्ग्योग ये स्थाई बीज है दिव्य चक्षु का ! इसे जो पाठ में लेवे चित्त से निज कर्म में !!४!!
यदृच्छा से योगक्षेम होवेगा उसका सदा ! अंत में पद सो पावे वेदों में श्रेष्ठ जो कहा !!५!!
अध्याय आंठ  में श्लोक नव पचास है ! आंठ  अस्सी अठारह्सो अक्षर में रचा इसे !!६!!
मायानंद ने अपना निज रूप लखा दिया ! ये जहा स्थिर हो जावे वही सदगुरु स्थान है !!७!!
(यहाँ “अनन्य भक्ति योग” नामक अध्याय आंठ्व सम्पूर्ण हुआ )

- BY परमहंस स्वामी अच्युतानंद सरस्वती

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