शबरी चरित्र : देवकी नंदन ठाकुर जी

shabri

प्रभु श्री राम के वनवास के दौरान मानस में शबरी चरित्र का उल्लेख है.  शबरी एक भील परिवार से थी । उसका स्थान प्रमुख रामभक्तों में था । वनवास के समय राम-लक्ष्मण ने शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया और उसके द्वारा प्रेम पूर्वक दिए हुए जूठे बेर खाए । राम ने उसके सद्व्यवहार और निष्ठा से प्रसन्न होकर उसे परमधाम जाने का वरदान दिया। जन श्रुति है कि द्वापर में शबरी ही मथुरा में कुब्जा नामक दासी के रूप में जन्मी थी।
कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,
मानहु एक भगति कर नाता.
प्रभु राम ने शबरी को भामिनी कह कर संबोधित किया. भामिनी शब्द एक अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है. प्रभु राम ने कहा कि हे भामिनी सुनो मैं केवल प्रेम के रिश्ते को मानता हूँ. तुम कौन हो, तुम किस परिवार मैं पैदा हुईं, तुम्हारी जाति क्या है, यह सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता. तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम ही मुझे तुम्हारे द्वार पर लेकर आया है. यदि जीवन में हम सच्चे मन से प्रभु भक्ति करें तो प्रभु का साक्षात्कार अवश्यमेव होता है.
जनम सफल होगा रे बन्दे, मन में राम बसा ले।
जय राम राम के मोती को, साँसों की माला बना ले॥
राम पतितपावन करुनाकर और सदा सुखदाता।
सरस सुहावन, अति मनभावन, राम से प्रीत लगाले॥
मोह माया है झूठा बंधन, त्याग उसे तू प्राणी।
राम नाम की ज्योत जला कर, अपना भाग्य जगा ले॥
राम भजन में डूब के अपनी, निर्मल कर ले काया।
राम नाम से प्रीत लगा कर जीवन पार लगा ले॥

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