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श्राद्ध 29 से शुरू, इस बार 17 दिन के

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हर धर्म में बड़ों व पूर्वजों के लिए सम्मान और श्रद्धा के भावों की खुशहाल जीवन के लिए बड़ी अहमियत बताई गई है। हर धर्म की बुनियाद भी श्रद्धा ही है। सनातन धर्म की बात करें तो पूर्वजों यानी पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का ही एक धार्मिक उपाय है – श्राद्ध कर्म।

धर्म परंपराओं में हिंदू पंचांग के आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि व कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तिथि तक पितृपक्ष या श्राद्धपक्ष माना जाता है। सनातन धर्म परंपराओं में इस पूरे पक्ष यानी 16 दिन का समय पूर्वजों को तृप्त करने और उनके प्रति आस्था प्रकट करने के लिए ही नियत किया गया है। इस बार पितृपूजा का यह शुभ काल 29 तारीख से शुरू हो जाएगा। 29 सितंबर को अनंत चतुर्दशी सुबह तक रहेगी और पूर्णिमा तिथि लग जाएगी। पितृ पूजा का महत्व मध्यान्ह काल में माना जाता है। इसलिए 29 सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध व 30 सितंबर को आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा का श्राद्ध किया जाएगा। वहीं, 3 तारीख को पंचाग भेद से तिथि बढ़ेगी और श्राद्ध पक्ष 15 अक्टूबर तक चलेगा। इस तरह पितरों का साथ इस बार 16 नहीं बल्कि 17 दिनों का रहेगा, जो बड़ा ही सुख-सौभाग्य देने वाला साबित होगा।

शास्त्रों में आश्विन माह की पूर्णिमा से शुरू कर आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक श्राद्ध करने के अलग-अलग फल भी बताए गए हैं। शास्त्रों के अनुसार खासतौर पर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध का विशेष महत्व है। इस कृष्ण पक्ष में पितरों का निवास माना गया है। इसलिए इस काल में पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध किए जाते हैं. अपने मृत पितृगण यानी पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक 16 दिन कर्म विशेष किए जाने के कारण इसका नाम श्राद्ध या सोलह श्राद्ध पड़ा। इसे ही पितृयज्ञ भी कहते हैं। ये महालय श्राद्ध भी कहलाते हैं। मह का अर्थ होता है ‘उत्सव का दिन’ और आलय यानी ‘घर’।पितरों की तृप्ति व प्रसन्नता के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक तिल, कुश या जल सहित कई तरह के दान, धर्म, पूजा व उपासना श्राद्ध के दौरान किए जाते हैं। इस तरह श्राद्ध पूर्वजों के प्रति श्रद्धा जगाता है। दरअसल चातुर्मास के दौरान आने वाले इस काल विशेष में भगवान के स्मरण के साथ-साथ देव समान अपने पूर्वजों के चरित्र और आचरण पर भी विचार कर कुछ सीख जरूर लेनी चाहिए। पितृपक्ष में हम अपने पूर्वजों का स्मरण कर उनके जीवन की अच्छाइयों को अपनाने का संकल्प लें। हमारे भीतर अच्छे गुणों को उतारना ही उनकी प्रसन्नता है (भास्कर)

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