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सूर्य नमस्कार

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हमारी दैनिक दिनचर्या में व्यायाम बेहद आवश्यक है | व्यायाम हमारे तन और मन दोनों को स्फूर्ती प्रदान करता है | ऐसा ही एक पूर्ण व्यायाम है सूर्य नमस्कार। योग हमारी संस्कृति की महत्वपूर्ण धरोहर है और एक प्राचीन विद्या भी। योग के माध्यम से तन, मन और आत्मा की शक्तियों का समन्वय कर विशेष लाभ लिया जा सकता है। सूर्य नमस्कार भारतीय योग का का सबसे अहम् हिस्सा है |

वास्तव में सूर्य नमस्कार विभिन्न आसन, मुद्रा और प्राणायाम का समन्वय है | जो हमारे शारीरिक और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रातः काल सूर्य नमस्कार करने से शरीर के सभी अंगों का पूरा व्यायाम हो जाता है | इसमें सूर्य की ऊर्जा का संचार होता है जिससे तन और मन का शुद्धीकरण होता है तथा शरीर को आवश्यक विटामिन डी की प्राप्ति भी होती है | वैज्ञानिकों ने भी अलग अलग शोधों के माध्यम से सूर्य नमस्कार के लाभों की पुष्टि की है। क्या है सूर्य नमस्कार ? :- प्रातः काल सूर्योदय के वक्त सूर्य नमस्कार तन, मन, वाणी से सूर्य का स्वागत है | सरल उपासना और सौम्य संतुलित व्यायाम सूर्य नमस्कार की प्रमुख विशेषता है | सूर्य नमस्कार सात आसनों का समुच्चय है।

1.प्रार्थना और मुद्रा 2.हस्त उत्तानासन 3.पादहस्तासन 4.अश्व संचालनासन 5.पर्वताआसन 6.आष्टांग नमस्कार 7.भुजंगासन

क्या हैं इसके फायदे ? :- सूर्य नमस्कार 12 स्थितियों से मिलकर बना है जिन्हें करने से बेहद लाभ प्राप्त होते हैं |
व्यायाम की तैयारियों के रूप में एकाग्र एवं शांत अवस्था लाता है |
अमाशय की अतिरिक्त चर्बी को हटाता है और पाचन को सुधारता है तथा भुजाओं और कन्धों की मांसपेशियों का व्यायाम होता है |
पेट तथा अमाशय के दोषों को नष्ट करता है कब्ज़ हटाने में सहायक है | रीढ़ को लचीला बनाता है तथा रक्त संचार में तेज़ी लाता है |
अमाशय के अंगों की मालिश कर कार्यप्रणाली को बेहतर बनाता है | पैरों की मांसपेशियों को शक्ति देता है |
भुजाओं तथा पैरों स्नायुओं की मांसपेशियों को ताकत देता है तथा सीने को विकसित करता है।
अमाशय के अंगों से जामे हुए रक्त को हटाकर नए रक्त का संचार करता है पेट के सभी रोगों के निदान लिए बेहद लाभकारी है |
रीढ़ के स्नायुओं का दबाव सामान्य बनाता है तथा ताजे रक्त का संचार करता है |

सूर्य नमस्कार के द्वारा त्वचा रोग समाप्त हो जाते हैं अथवा इनके होने की संभावना समाप्त हो जाती है। इस अभ्यास से कब्ज आदि उदर रोग समाप्त हो जाते हैं और पाचनतंत्र की क्रियाशीलता में वृद्धि हो जाती है। इस अभ्यास के द्वारा हमारे शरीर की छोटी-बड़ी सभी नस-नाड़ियाँ क्रियाशील हो जाती हैं, इसलिए आलस्य, अतिनिद्रा आदि विकार दूर हो जाते हैं। सूर्य नमस्कार में सभी आसन निहित है । इसके 12 चरण पूर्ण करने पर एक सूर्य नमस्कार पूर्ण होता है । प्रतिदिन लगभग दस सूर्य नमस्कार करने से शरीर में नई स्फूर्ति पैदा होती है और मानसिक शांति भी मिलती है । योग की दृष्टि से सूर्य नमस्कार के नियमित अभ्यास से मानव प्रकृति का सौर पक्ष अर्थात पिंगला नाड़ी जागृत होती और सिर से पैर तक का उज्जीवन होता है । इससे न सिर्फ शरीर पुष्ट होता है, बल्कि शारीरिक व्याधियां भी दूर होती हैं और तेज बढ़ता है । आंखों की ज्योति बढाने के लिए सूर्य नमस्कार रामबाण औषधि है । सूर्य नमस्कार से जीवन दायिनी ऊर्जा प्राप्त होती है, जिससे सर्वोच्च चेतना का विकास होता है । देश का मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर, जहां की एक बड़ी आबादी योग में खूब रुचि ले रही है। सूर्य नमस्कार तन और मन को स्वस्थ करने का एक वैज्ञानिक तरीका है। यह अभ्यास तमाम बीमारियों से बचाता है और इससे शरीर लचीला, सुडौल व चुस्त बनता है। सूर्य भगवान के बारह नामों के कारण सूर्य नमस्कार की बारह अवस्थाएं हैं, जिनका अभ्यास एक क्रम में किया जाता है।

इस क्रम को आप अपनी शक्ति के अनुसार तीन से बारह बार तक दोहरा सकते हैं। पूरे अभ्यास में ध्यान को भगवान सूर्य पर एकाग्र कर मन में यह भाव रखा जाता है कि सूर्य का सीधा प्रकाश मेरे ऊपर पड़ रहा है और मैं प्राणवान, तेजवान, ओजवान व बलवान हो रहा हूं।

सूर्य नमस्कार का अभ्यास उदित होते सूर्य के समय करने से ज्यादा फायदा होता है। इसके लिए सुबह नित्य कर्म से निबटने के बाद खाली पेट पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हो जाएं और अभ्यास शुरू करें।

सूर्य नमस्कार में सभी आसनों का सार छिपा है। सूर्य नमस्कार योगासनों में सर्वश्रेष्ठ है। इस योग में लगभग सभी आसनों का समावेश है। सूर्य नमस्कार साधक को सम्पूर्ण लाभ पहुँचाने में समर्थ है। इसके अभ्यास से साधक का शरीर निरोग और स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है। सूर्य नमस्कार का अभ्यास बारह स्थितियों में किया जाता है। इसकी भी दो स्थितियाँ होती हैं- प्रथम दाएँ पैर से और द्वितीय बाएँ पैर से।Surya_Namaskar

पहली स्थिति
पहले सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएँ। फिर दोनों हाथों को कंधे के समानांतर उठाते हुए दोनों हथेलियों को ऊपर की ओर ले जाए। हथेलियों के पृष्ठ भाग एक-दूसरे से चिपके रहें। फिर उन्हें उसी स्थिति में सामने की ओर लाएँ। तत्पश्चात नीचे की ओर गोल घुमाते हुए नमस्कार की मुद्रा में खड़े हो जाएँ। सीधे खड़े होकर पैरों को आपस में मिला लें और दोनों हाथों को जोड़कर आंखें बंद कर लें। सांस की गति सामान्य रखें।

दूसरी स्थिति
श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा कमर से पीछे की ओर झुकते हुए भुजाओं और गर्दन को भी पीछे की ओर झुकाएँ। यह अर्धचक्रासन की स्थिति मानी गई है। तीसरी स्थिति
तीसरी स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकें। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएँ-बाएँ पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। इस स्थिति को पाद पश्चिमोत्तनासन या पादहस्तासन की स्थिति कहते हैं।

चौथी स्थिति
इसी स्थिति में हथेलियाँ भूमि पर टिकाकर श्वास को भरते हुए बाएँ पैर को पीछे की ओर ले जाएँ। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। दाएं घुटने को मोड़कर सिर को आगे की ओर उठा लें। इस मुद्रा में टाँग तनी हुई सीधी पीछे की ओर और पैर का पंजा खड़ा हुआ रहना चाहिए। इस स्थिति में कुछ समय रुकें।

पांचवीं स्थिति
अब श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते दूसरा पांव भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियाँ परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएँ। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कंठ में लगाएँ।

छठी स्थिति
अब सांस छोड़ते हुए दोनों घुटनों, छाती और माथे को जमीन पर लगाएं। यहां नितंब थोड़े ऊपर की ओर उठे रहेंगे। श्वास की गति सामान्य रखें।

सातवीं स्थिति
अब सांस भरते हुए सिर व छाती को ऊपर की ओर उठाएं और कमर व गर्दन को जितना हो सके, पीछे की ओर ले जाएं। इस स्थिति को भुजंगासन की स्थिति कहते हैं।

आठवीं स्थिति
सांस छोड़ते हुए नितंबों को ऊपर की ओर उठाएं और शरीर की आकृति पर्वत के समान बना लें। यहां एडि़यां ज़मीन पर होंगी और सिर को अधिक से अधिक पैरों की ओर ले जाएं। यह स्थिति पाँचवीं स्थिति के समान है। जबकि हम ठोड़ी को कंठ से टिकाते हुए पैरों के पंजों को देखते हैं।

नौवीं स्थिति
अब सांस भरते हुए दायां पैर उठाकर दोनों हाथों के बीच में रख लें व सिर को ऊपर की ओर उठा लें। यह स्थिति चौथी स्थिति के समान है।

दसवीं स्थिति
फिर सांस निकालते हुए दायां पैर उठाकर बाएं पैर के साथ दोनों हाथों के बीच में रख लें और घुटनों को सीधा रखते हुए माथे को घुटनों पर लगाने की कोशिश करें। बिल्कुल तीसरी स्थिति के अनुसार।

ग्यारहवीं स्थिति
सांस भरते हुए अब हाथों को धीरे-धीरे आकाश की ओर उठाएं व कमर को पीछे की ओर थोड़ा मोड़कर रखें। बिल्कुल दूसरी स्थिति के जैसे।

बारहवीं स्थिति
अंत में सांस बाहर निकालते हुए दोनों हाथों को नमस्कार मुद्रा में छाती के बीच में रख लें। पहली स्थिति के जैसे। यह मुद्राएं सूर्य नमस्कार की हैं। इन सभी मुद्राओं को क्रम से करने पर एक सूर्य नमस्कार पूर्ण होता है। हमें प्रतिदिन प्रातःकाल बारह बार सूर्य नमस्कार करने चाहिए। प्रत्येक सूर्य नमस्कार की पहली मुद्रा में सूर्य भगवान् का एक मंत्र उच्चारण करना चाहिए और अगले सूर्य नमस्कार को आरंभ करते हुए दूसरा मंत्र।

बारह सूर्य नमस्कार करने के लिए नीचे सूर्य के बारह मन्त्र दिये गये हैं।
ॐ मित्राय नम:॥१॥
ॐ रवये नम:॥२॥
ॐ सूर्याय नम:॥३॥
ॐ भानवे नम:॥४॥
ॐ खगाय नम:॥५॥
ॐ पूष्णे नम:॥६॥
ॐ हिरण्यगर्भाय नम:॥७॥
ॐ मरीचये नम:॥८॥
ॐ आदित्याय नम:॥९॥
ॐ सवित्रे नम:॥१०॥
ॐ अर्काय नम:॥११॥
ॐ भास्कराय नम:॥१२॥

सावधानी :कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न यह योग न करें। सूर्य नमस्कार की तीसरी व पाँचवीं स्थितियाँ सर्वाइकल एवं स्लिप डिस्क वाले रोगियों के लिए वर्जित हैं। कोई गंभीर रोग हो तो योग चिकित्सक की सलाह से ही सूर्य नमस्कार करें।
(साभार- धर्मचक्र )

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