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तात तीन अति प्रबल खल…!

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संतों ने कहा है कि मानव और परमात्मा के बीच छह दुश्मन खड़े हैं जिन्हे षट-रिपु कहा जाता है. ये षट-रिपु हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और द्वेष. और ये बड़े मज़े की बात है कि ये एक श्रंखला मे चलते हैं. इनमे भी जो पहले 3 हैं उनको सर्वाधिक प्रबल कहा गया है. महात्मा तुलसीदास कहते हैं – तात तीन अति प्रबल खल, काम, क्रोध अरू लोभ! इन छह मे से पहले तीन को समझना और इनके पार जाना सबसे कठिन है. आओ इनको समझें और देखें कैसे इनसे मुक्त हुआ जाता है!

Buddha

taat teen ati prabal khal

1. काम : काम का साधारणतया ग़लत अर्थ लिया जाता रहा है, काम का अर्थ लोग कामवासना के रूप मे लेते हैं जबकि इसका सही अर्थ है – कामना! कामना का अर्थ होता है – विषयों मे रस. और विषय क्या है? विषय है तुमसे बाहर जो भी है, व्यक्ति, वस्तु, या विचार इत्यादि. इस सन्दर्भ मे कामवासना भी एक विषय है क्योंकि इसमे आदमी किसी दूसरे के शरीर से सुख की अनुभूति करना चाहता है. यानी दूसरे मे रस काम है! संतों ने कहा है कामना दुख का मूल है. अश्टावक्र महाराजा जनक से कहते है – जनक! कामना सी व्याधि नही और निष्कामना सी समाधि नही. कामना से मुक्ति के दो उपाय हैं – भोग से या समझ से. महात्मा बुद्ध ने राजमहल मे रहते हुए सभी सुखों को भोग कर अनुभव कर लिया कि सांसारिक विषयों के भोग से आनंद फलित नही होता और वही पर कबीर साहब जैसे संतों ने बिना भोग के झोपंडी मे रहते हुए जान लिया की विषय-भोग व्यर्थ हैं. तो इसलिए या तो भोग कर देख लो की कितना रस है भोग मे या दूसरों को भोगते हुए देखकर समझ जाओ की भोग से इनके जीवन मे कितना आनंद आया. विषय-भोग की कामना दुष्पुर है यह जानना कामना से मुक्ति है!

2. क्रोध : जब भी तुम्हारी कामना की पूर्ति नही होगी तभी क्रोध का जन्म होगा. जो व्यक्ति तुम्हारी कामना के रास्ते मे बाधक बनेगा उसके प्रति तुम्हारे अंदर क्रोध उत्पन्न होगा. क्रोध तीन प्रकार का होता है – अतीत का क्रोध यानी संचित क्रोध, वर्तमान का क्रोध और भविष्य का क्रोध.
अतीत के क्रोध से मुक्ति के लिए अपने आप को कमरे मे बंद करके खूब रेचन करो, चीखो, चिल्लाओ, या रोवो, गाओ या ताली बजाओ. इस प्रकार अपने क्रोध को एक आऊटलेट दो बाहर निकलने के लिए.
वर्तमान के क्रोध से मुक्ति के लिए अपने क्रोध के प्रति जागो. समझो अगर किसी ने तुम्हारा अपमान कर दिया, तुम्हारी चेतना मे एक उर्जा पैदा हुई. इस कंपित उर्जा के प्रति होश से भर जाओ. अपमान करने वाले व्यक्ति से ध्यान हटा कर अगर आप इस क्रोध और अशांति के प्रति जागे रहे तो पाओगे जल्दी ही अशांति विदा हो जाती है और शांति का जन्म होता है. यह क्रोध ही देखने मात्र से शांति मे रूपांतरित हो जाता है.
भविष्य के क्रोध से मुक्ति के लिए मनुष्य का ये जानना आवश्यक है की किन विशेष परिस्थितियों मे उसे गुस्सा आता है. ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?’ जैसे मान लो तुम्हे गुस्सा आता है जब कोई तुम्हे सलाह देता है तो जब कोई तुम्हारा दोस्त, शिक्षक, माता-पिता या कोई और तुम्हे सलाह देने लगे तो अपने भीतर खुद को याद दिलाओ की देखो गुस्सा होने की ज़रूरत नही है ये व्यक्ति सिर्फ़ सलाह ही तो दे रहा है.

3. लोभ : लोभ है और ज़्यादा की माँग, जितना तुम्हारे पास है उससे संतु   ्टि नही मगर ज़्यादा से ज़्यादा संग्रह की प्रवर्ती. जो पास मे है उसके लिए कोई सम         मान नही मगर जो नही मिला उसके लिए परेशान. लोभ से मुक्ति के लिए आसान सा उपाय है – शेयर करना शुरू करें, जो तुम्हारे पास है उसका थोड़ा सा लोगों के साथ बाँटना शुरू करें! जब तुम्हे शेयर करने मे आनंद आना शुरू होगा तो लोभ से मुक्ति होना शुरू हो जाएगा.

4. मोह : मोह है – Attachment. मोह यानी मेरे का भाव! मेरे के खोने का, बिछूड़ने का दर! मोह से मुक्ति के लिए सदगुरु ओशो सिद्धार्थ जी उमर ख़य्याम की एक रुबाई को हुए उद्धरत करते कहते हैं ;

जाग प्यारे मौज-मस्ती है मानती जिंदगी
इस फ़ना के बाग को कुछ पल सजाती जिंदगी!
मुक्त हो जा मृत्यु से तू, राम रस का पान कर
क्या पता किस वक्त कब, खो जाए प्यारी जिंदगी!

जो व्यक्ति वस्तुओं को पकड़ कर रखना चाहता है वा स्वयं को प्रेम नही करता. स्वयं को प्रेम करना , अपने जीवन से प्रेम करना मोह से मुक्त करता है.

5. ईर्ष्या : ईर्ष्या पैदा होती है तुलना से. लेकिन जिस आदमी से ईर्ष्या हो उसका कोई संबंध तुमसे होना ज़रूरी है , वह आदमी तुम्हारे पास का हो, तुम्हे जानता हो और उसके पास तुमसे अधिक हो. ज़रा सोचो मुकेश अंबानी के पास तुमसे कितनी ज़्यादा संपत्ति है लेकिन क्या तुम्हे मुकेश अंबानी से ईर्ष्या है. नही ना…? क्योंकि मुकेश अंबानी और तुम मे कोई संबंध ही नही. लेकिन तुम्हारा पड़ोसी या मित्र अगर तुमसे बड़ी कार खरीद ले या बड़ा मकान बन ले तो ईर्ष्या पैदा हो सकती है. ईर्ष्या का कारण यह है की तुम अपने पड़ोसी का सम्मान नही करते हो. अगर तुम्हारा पड़ोसी तुमसे बड़ी कार ले आया तो उसका सम्मान करो की ज़रूर परमात्मा ने यदि इसे कार बक्शी है तो ये डिजर्व करता है. मेरा पड़ोसी इतना अच्छा है की ये कार तो इसे मिलनी ही चाहिए थी. यदि तुम अपने और अपने पड़ोसी या जिस व्यक्ति के प्रति तुम्हारे मन मे ईर्ष्या हो उसके प्रति सम्मान से भर जाओ तो ईर्ष्या मुक्त हो सकते हो!

6. द्वेष : ईर्ष्या जब अपने चर्म को छू लेती है तो द्वेष बन जाती है. द्वेष मे व्यक्ति दूसरे को नुकसान पहुँचने तक के मौके की ताक मे रहता है. तुम जिस से द्वेष करते हो चाहोगे की उसका नुकसान हो जाए. तुम जिस से प्रेम करते हो उसे भले ही याद ना रखो मगर जिस से द्वेष करते हो उसे कभी नही भुला पाते. द्वेष से मुक्ति के लिए पहला कदम है जिसके प्रति द्वेष है उसे माफ़ करना और दूसरा है की जीवन उर्जा जो अभी तक द्वेष मे लगी है उसे स्राजनात्मक कार्यो मे लगाना. इस प्रकार तुम द्वेष से मुक्त हो सकते हो.

जयकुमार राणा

(लेखक जाने माने  ब्लॉगर है)

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