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The Spiritual Touch

संवाद भगवान् से : आचार्य श्री महाश्रमण

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Acharya_Mahashraman

धर्मकथा का पहला लाभ यह है कि कर्मों की निर्जरा होती है |
धर्मकथा करने से पाप कटते हैं |
दूसरों को लाभ मिले या न मिले,
किन्तु स्वयं को लाभ मिल जाएगा |

सामायिक से जीव क्या प्राप्त करता है ?
सामयिक में सावद्द योग से पच्क्खान किया जाता है |
सावद्द = स+ अवद्द = स का अर्थ है सहित और अवद्द का अर्थ है पाप |
अर्थात पाप सहित प्रवृत्ति का त्याग |
४८ मिनट के लिए श्रावक साधू की भूमिका में हो जाता है |
इसलिए बहुत सामायिक करनी चाहिए |

आलोचना से क्या मिलेगा ?
तेरापंथ के प्रथम आचार्य श्री भिक्षु के पास किसी दूसरी परम्परा के मुनि ने आकर आलोचना की |
आचार्य भिक्षु के परम शिष्य मुनि हेमराज जी ने पूछा -
गुरुदेव ! किस बात की आलोयणा की |
भिक्षु स्वामी बोले – यह बताना नहीं कल्पता है |
गोपनीयता रखना गुरु का काम होता है |

माया शल्य – छल-कपट करने की वृत्ति, बात को ढकने की वृत्ति |
निदान शल्य – आकांक्षा करना, मेरी तपस्या का फल हो |
मिथ्यादर्शन शल्य -मिथ्या दृष्टिकोण, जो जैसा है वैसा न मानना, गलत रूप में मानना |
कोई कांटा न निकले तो तकलीफ बढ़ जाती है, निकलते ही आराम आता है;
वैसे ही ये शल्य कष्टदायी होते हैं |

कई बार आदमी पाप को छोड़ना भी नहीं चाहता और
पापी कहलाना भी नहीं चाहता |
आलोचना करने से शल्यों का उद्धरण हो जाता है |
जैन वांग्मय में ३ शल्य माने गए हैं -
माया शल्य,
निदान शल्य,
मिथ्यदर्शन शल्य |

भाषा – बोलकर, लिखकर और संकेत से अभिव्यक्त की जाती है |
वाक्-निपुण और वाक्-संयम दोनों जरुरी है,
इसके साथ-साथ मौन भी जरूरी है |
मौन भी वाणी-संयम का प्रयोग है |
पर मौन नींद में नहीं करना चाहिए |
अनावश्यक न बोलना भी मौन है |

आदमी के पास भाषा लब्धि होती है |
पृथ्वी, पानी आदि के जीवों को भाषा प्राप्त नहीं होती |
लट, चींटी, मच्छर, मक्खी आदि प्राणियों में कुछ आवाज़ होती है |
पुरे विश्व में कितनी भाषाएँ हैं, मनुष्य सीमित भाषाएँ जानता है |
मनुष्य को कितने पुण्य के योग से भाषा प्राप्त हुई है |
उसका पाप में, हिंसा में प्रयोग न करे |

एक गरीब व्यक्ति साधू को बोला – महाराज ! मुझ पर कृपा करो, बहुत गरीब हूं |
बाबा ने सामने इशाराकिया कि वो पत्थर उठा लो, लोहे को छूने से सोना बन जाएगा |
व्यक्ति ने जल्दी से पत्थर उठाया और चला |
थोडा आगे बढते ही ठिठक गया |
वापस लौटा, बोला – बाबाजी, आपने इस पत्थर को जिस चीज के लिए त्याग दिया; मुझे भी वही चाहिए |
( सभी तीर्थंकर राज-परिवार से हुए हैं )

नाक !
मुंह पर नाक न हो तो …
नाक से श्वास और गंध को ग्रहण किया जाता है |
सुगंध या दुर्गन्ध कुछ भी आये,
समता भाव से सहन करे |
साधना के क्षेत्र में श्वास का बड़ा ही महत्व है |
भगवान् महावीर की दृष्टि साधना के समय नासाग्र पर रहती थी |

कान -
कान हमेशा खुले रहते हैं,
आँखों को बंद कर सकते है,
पर सामान्यतया कान बंद नहीं कर सकते |
प्रशंसा सुनी अच्छा लगा |
उपालंभ सुना, आक्रोश आ गया |
श्रोत्रेंद्रिय-निग्रह की साधना करें,
तो शांति बनी रहेगी |

१. यौवन २. धन-संपत्ति ३. सत्ता और ४. अविवेक -
इस चारों में से एक भी चीज विकृत करने वाली है |
चारों का योग हो जाए तो फिर क्या कहने ?
पर विवेक हो तो यौवन भी काम का होता है,
सत्ता भी और धन-संपत्ति भी काम के होते हैं |
आचार्य श्री महाश्रमण

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