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मैं पंडितों का नहीं उनके पाखंड का विरोधी हूं : मुनि तरुणसागर

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मैं पंडितों का नहीं उनके पाखंड का विरोधी हूं : मुनि तरुणसागर

प्रखर वक्ता जैन मुनिश्री तरुणसागर जी ने कहा कि शिक्षा–दीक्षा के लिए होनी चाहिए। आज शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका का साधन रह गया है। शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं, जीवन की साधना भी है। मनुष्य जब इस सृष्टि में जनम लेता है, तो पूर्ण रूप से मनुष्य नहीं होता। जब तक मानव– चेतना में सत्संस्कारों का रोपण नहीं होगा, तब तक वह पूर्ण मनुष्यता नहीं पा सकता। अच्छी शिक्षा व अच्छे संस्कारों से ही आदमी पूर्ण होता है। शिक्षा वहीं परिपूर्ण होती है जो जीवन में उदात्त विचार, सुसंस्कार तथा जीवन जीने की कला सिखाती हो। हमें नई पीढ़ी को, उसके परिवार, समाज, धर्म व राष्ट्र के प्रति क्या कत्र्तव्य है, इसका बोध कराना है। आज स्थिति यह है कि एक बूढ़ा बाप अपने चार बच्चों की परवरिश तो कर सकता है, लेकिन चार बेटे मिलकर भी अपने बूढ़े मां–बाप की परवरिश नहीं कर पाते हैं। याद रखना– जो अपने बूढ़े मां–बाप का नहीं हो सका, वह परमात्मा का हो जाए, असंभव है।

मुनिश्री ने आज से शुरू हुए सप्त दिवीय साधना–ज्ञान शिविर का उद्देश्य व उपयोगिता बताते हुए कहा कि शिविर का उद्देश्य नई पीढ़ी में संस्कारों का शंखनाद करना है। यदि हमने समय रहते नई पीढ़ी को धार्मिक संस्कार न दिए तो हम उनके हत्यारे सिद्ध हो जाएंगे। आज हर मां–बाप अपने बेटे की शिक्षा को लेकर चिंतित है। वह चाहते हैं कि हमारा बेटा उच्च से उच्च, अच्छी से अच्छी शिक्षा प्राप्त करें। लेकिन अच्छे संस्कारों के लिए कोई मां–बाप चिंतित नहीं है। प्रत्येक मां–बाप अपनी संतान को अच्छा डाक्टर, अच्छा वकील, अच्छा इंजीनियर, अच्छा आईएएस अफसर तो बनाना चाहते हैं, लेकिन कोई मां–बाप अपनी औलाद को अच्छा आदमी बनाना नहीं चाहता। अच्छे आदमी का जन्म अच्छे संस्कार से होता है। अच्छी शिक्षा, अच्छा डाक्टर, अच्छा वकील, अच्छा इंजीनियर तो बना सकती है, लेकिन अच्छा इंसान नहीं बना सकती। आज समाज व राष्ट्र में अच्छे इंसानों का, जो सहृदय हों, सेवाभावी हों, स्वार्थ से परे हों, शनै: शनै: अभाव होता जा रहा है। यह दुर्भाग्य का विषय है। यह शिविर आदर्श नागरिक की निर्माण शाला सिद्ध हो, यही मेरी हार्दिक तमन्ना है।

शिक्षा और संस्कार में फर्क बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि शिक्षा जीवन–निर्वाह की कला सिखाती है जबकि संस्कार जीवन–निर्माण की कला सिखाता है। जीवन का निर्वाह सरल है। पशु–पक्षी भी जिस किसी प्रकार से जीवन का निर्वाह कर लेते हैं, पेट भर लेते हैं और जिंदगी जी लेते हैं, लेकिन पृथ्वी पर एकमात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो ‘जीवन–निर्वाह’ के साथ ‘जीवन–निर्माण’ भी कर सकने की पात्रता लेकर पैदा होता है। और यदि वह जीवन निर्माण की दिशा में नहीं बढ़ता तो उसमें और पशु में कोई अंतर नहीं रह जाता। शिविरार्थी यहां भाईचारें, स्वावलंबन तथा सहयोग की भावना तो विकसित करेंगे ही, स्वयं के व्यक्तित्व विकास के लिए भी गतिशील होंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। शिविरार्थियों को लक्ष्य में रखकर मुनिश्री ने कहा कि यहां अनुशासन सीखना है, क्योंकि अनुशासन व्यक्ति, समाज व राष्ट्र को महान बनाता है। लेकिन यह अनुशासन आत्मप्रेरित होना चाहिए। ऊपर से आरोपित नहीं। अनुशासन और मर्यादा संसार लोक से सिद्धालय तक पहुंचने के लिए दो पटरियों के समान है। जो स्वयं अनुशासनबद्ध है, वहीं दूसरों को अनुशासन सिखा सकता है। समाज में जीना है तो अनुशासन में जीना होगा, और यह अनुशासन धर्म ही सिखाता है। शिविरार्थी कम से कम बोलें, क्योंकि ज्यादा बोलने से मन ज्यादा चंचल बनता है। भाषा दूसरों से जोड़ती है और स्वयं से तोड़ती है। तुम यहां स्वयं से जुड़ने आए हो और मौन ही स्वयं से जोड़ता है। अत: मौन रखें या कम से कम वचन–व्यवहार करें। आपस में जब भी एक–दूसरे से मिलें, ‘जय जिनेंद्र’ कहकर अभिवादन करें। किसी की निंदा–चुगली कतई न करें आपस में गाली–गलौच न करें, क्रोध पर पूरा नियंत्रण रखें। दीर्घ श्वास लें। ध्यान में, कक्षा में, प्रवचन–सभा में, प्रश्न–मंच में समय पर उपस्थित हों, समय का मूल्य समझें, ताकि समयसार जीवन में प्रगट हो सके।

मुनिश्री ने समयसार की चर्चा करते हुए कहा कि समयसार में जैनाचार्य कुंदकुंद ने आत्मा की उच्चतम स्थिति का वर्णन किया है जो सामान्य संसारी जनों की समझ के परे है। आचार्य कुंदकुंद ने जिस अनंत ऊंचाई की बात की है, वहां तक गृहस्थों और पंडितों की पहुंच संभव नहीं है।

समयसार मूलत: मुनि और आचार्यों की विषय वस्तु है। लेकिन जैन समाज का यह दुर्भाग्य है कि जिन्हें समय देखना नहीं आता, वे समयसार पढ़ रहे हैं। जिन्हें पानी छानना नहीं आता, वे समयसार के प्रवक्ता बने बैठे हैंं। जिनका रात्रि–भोजन और सप्त–व्यसन का त्याग नहीं है, वे समयसार की व्याख्या कर रहे हैं। याद रखना–शास्त्रों की गद्दी पर वही बैठ सकता है, जो सप्त–व्यसन का त्यागी हो और अष्ट मूलगुण का पालन करता हो, मन्दकषायी हो, रात्रि–भोजन का त्यागी तथा देव–गुरू–शास्त्र के प्रति परम आस्था रखता हो। यदि संतों–मुनियों के प्रति तुम्हारे मन में आस्था नहीं तो महावीर और कुंदकुंद से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं है।

आचार्य कुंदकुंद ने जिस सत्य का अनुभव गिरि–कन्दरा, गुफा में बैठकर किया था, तुम उसे एयर कंडीशनर रूम में, डनलप के गद्दों पर, थम्स–अप पीते हुए करना चाहते हो। यह सिर्फ कुंदकुंद के साथ ही नहीं, स्वयं की जिंदगी के साथ भी गहरा मजाक है। समयसार गरिष्ठ भोजन है, सिंहों का भोजन है और सिंहों का भोजन गधे नहीं पचा सकते (तालियां)।

मुनिश्री ने आगे कहा कि गृहस्थ को, श्रावक को सबसे पहले जैन–सिद्धांत–प्रवेशिका, छह ढाला पढ़ना चाहिए। इसके पश्चात् पद्मपुराण, आदिनाथपुराण, महावीर चरित्र और फिर रत्नकरण्ड श्रावकाचार, द्रव्यसंग्रह, कार्तिकेयानुप्रेक्षा आदि ग्रंथों का स्वाध्याय करना चाहिए।

अंत में समयसार पढ़ना चाहिए, वह भी पंडित बनकर नहीं, मुनि बनकर। और यदि मुनि बनना तुम्हारे सामथ्र्य की बात न हो और समयसार पढ़ने को ज्यादा मन मचले तो किसी आचार्य–मुनि के सान्निध्य में बैठकर पढ़ना चाहिए। यदि आचार्य के सान्निध्य में पढ़ोगे तो बहकोगे नहीं, जैसे कि आज के कुछ तथाकथित पंडित बहक गए हैंं। क्योंकि संतों ने समयसार को आचार्य, कुंदकुंद को जीया है इसलिए समयसार के बारे में वहीं बता सकते हैं। बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद और पंडित क्या जाने…? यह मत समझना कि मैं पंडितों का विरोधी हूं। मैं पंडितों को नहीं, उनके पाखंड का विरोधी हूं। जिस पंडित की कथनी और करनी में अंतर है, वह पंडित नहीं, व्यन्तर है।

पंडित और घड़ी दुनिया के सबसे बड़े बेईमान हैं। घड़ी में तीन कांटे होते हैं, जो सबसे बड़ा कांटा होता है सेकण्ड का, वह सबसे छोटा काम करता है। पंडित के पास भी बातें बड़ी–बड़ी होती हैं, लेकिन चर्या कुछ नहीं होती हैं। पंडित तो केवल बातों के बादशाह होते हैं, यों कहो कि बातूनी होते हैं। महावीर कहते हैं– बातों के बादशाह नहीं, आचरण के आचार्य चाहिए। हां, कुछ पंडित हैं, जो मायने में पंडित हैं, जो व्रती हैं, भद्रपरिणामी हैं, मंद–कषायी हैं, वे पंडित सम्मान व आदर के पात्र हैं। मुनिश्री ने आगे कहा कि यूं तो आपने कई शिविर अटेंड किए होंगे और यहां तो शिविर आए दिन लगते रहते हैं। लेकिन उन शिविरों और इस शिविर में बड़ा अंतर होगा। अभी तक तो शिविर लगे, वे पंडित तैयार करने के लिए लगे होंगे। मैं तुम्हें पंडित नहीं बनाऊंगा, मैं तुम्हारी प्रज्ञा को जागृत करूंगा। मैं तुम्हें विद्वान नहीं बनाना चाहता हूं, मैं तुम्हें ऋषि बनाना चाहता हूं। अभी तक तुम्हें ज्ञान और सिद्धांत की बड़ी–बड़ी बातें सिखाई गई होंगी। मैं तुम्हें ज्ञान और सिद्धांत नहीं सिखाऊंगा, क्योंकि महावीर पांडित्य के भूखे नहीं हैं, महावीर आचरण के भूखे हैं।

मैं जीवन जीने के सूत्र बताऊंगा। श्रावक की चर्या क्या है? श्रावक के कर्तव्य क्या हैं? दुकान और दफ्तर में रहकर आप धर्म और कर्तव्य का पालन कैसे कर सकते हैं, यह बताऊंगा। यहां थ्योरिटीकल–आत्मक नहीं, प्रेक्टीकल ज्ञान व संस्कार का शिक्षण दिया जाएगा। ज्ञान के अनुरूप आचरण हो, तो ही जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन संभव है। जिस ज्ञान के होने पर आचरण, विनम्रता, श्रद्धा, भक्ति–भावना प्रकट नहीं होती, वह ज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं, ज्ञान का व्यभिचार है।

मुनिश्री ने कहा कि मां की गोद में बच्चे की पहली पाठशाला होती है। मां की गोद में बालक जो सीखता है, वह जीवनभर नहीं भूलता है। माताओं–बहनों को प्रारंभ से ही अपने बच्चों को सम्यक् संस्कार देना चाहिए। इसके लिए मां–बाप का धार्मिक व सुसंस्कृत होना जरूरी है। बच्चे कच्ची मिट्टी की मानिंद हैं, मां–बाप को उनके साथ कुशल कुंभकार की भूमिका निभानी चाहिए। बच्चे सिखाने से नहीं सीखते, बच्चे दिखाने से सीखते हैं। कल ही मैं संत–निवास में बैठा हुआ था। एक सज्जन आए, उनके साथ उनकी पत्नी और दो–तीन साल का पप्पू भी था। वे अपने बेटे से बार–बार कह रहे थे कि महाराज श्री की जय कर ले, नमोस्तु कर ले, बेटा कर नहीं रहा था। वे जबर्दस्ती उसकी गर्दन पकड़कर सिर झुका रहे थे। बेटा सिर झुकाने को तैयार नहीं था।
मैंने उनसे कहा– आप गलती कर रहे हैं। आप चाहते कया हैं?
उन्होंने कहा – यह जय हीं कर रहा है, नमन नहीं कर रहा है।
मैंने कहा – ऐसे नहीं करेगा।
उन्होंने पूछा – फिर कैसे करेगा? मैंने कहा– आप करिये, आप बैठकर करिये, वह आपको देखकर अपने आप कर लेगा। और उन्होंने बैठकर ज्यों ही नमोस्तु किया, बेटे ने भी तुरंत वैसा ही किया।

इसलिए मैंने कहा कि बच्चे सिखाने से नहीं सीखते, दिखाने से सीखते हैं। यदि अपनी संतान को आचरण या सुसंस्कार देना है, तो मां–बाप को, अभिभावकों को आचरणवान और संस्कारवान होना अति आवश्यक है। संस्कार जीवन में वहीं दे सकता हैं, जिसने जीवन में आचरण किया है। जैसे जला हुआ दीपक ही बुझे हुए दीपक को जला सकता है। बुझा हुआ दीपक क्या किसी को जलाएगा, बल्कि हाथ ही काला करेगा। संत प्रकाशित दीये हैं जो अपने आलोक से समाज को आलोकित करते हैं। संत संस्कारों की जीवंत पाठशाला होते हैंं जो संतों से जुड़ेगा उसमें संतत्व व सत्य अवश्य घटित होगा। पंडितों से जुड़कर तो काफी देख लिया। अब एक बार संतों से जुड़कर भी तो देखिए कि संत क्या होते हैं। उनकी जीवन–चर्या क्या होती है? सत्संग का आनंद क्या होता है? संत–मुनियों की महिमा समझनी है तो उनके निकट जाना जरूरी है। दूर रहकर संत मुनियों के माहात्म्य को जान पाना कठिन ही नहीं, असंभव भी है।

मुनिश्री ने बेबाक शब्दों में कहा कि संत–मुनियों का जीवन तो दर्पण की तरह होता है। वे निर्दोष होते हैं। फिर भी कभी यदि किसी मुनि में कोई दोष, कोई कमी दिखे तो उसे तुरंत नोट कर लेना, जब भी किसी भी मुनि–आचार्य में कोई दोष–त्रुटि दिखे तो उसे नोट कर लेना और संकल्प करना कि मैं मुनि बनूंगा तो यह दोष नहीं करूंगा, यह भूल नहीं करूंगा (तालियां) संतों के जीवन से साधना और त्याग का पाठ सीखो, उन्हें श्रद्धा से देखो शांति से पूजो, जिज्ञासा से सुनो।

मुनिश्री ने एक उदाहरण दिया। एक सभा में मुल्ला नसरूद्दीन की पत्नी अपने दो वर्ष के बच्चे को साथ लेकर उपस्थित हुई। महिलाओं की सभा थी। संभ्रांत परिवारों की महिलाएं एकत्रित हुई थीं। कोई अखिल भारतीय महिला सम्मेलन रहा होगा। कार्यक्रम चल रहा था कि मुल्ला नसरूद्दीन का बच्चा रो पड़ा।
मां ने पूछा – क्या हुआ? क्यों रोता है?
बेटे ने कहा – मां पेशाब जाना है। महिला को कुछ अच्छा न लगा। उसने सोचा कि मेरी सहेली क्या सोचेगी? बड़ी कंजूस है, बच्चे की परवरिश के लिए नौकर भी नहीं रख सकती। यद्यपि किसी सहेली को इतनी फुर्सत नहीं थी कि वह यह सब फालतू की बातें सोचें। आदमी बड़ा मूर्ख है। स्वयं ही सोच लेता है कि सामने वाला तुम्हारे बारे में क्या सोच रहा है। भले ही वह कुछ न सोच रहा हो, लेकिन तुम निर्णय कर लेते हो कि वह क्या–क्या सोच रहा है तो महिला को कुछ क्रोध आया। उसने बेटे का हाथ पकड़ा, सभा से बाहर लाई और एक चांटा मार दिया। बेटा तो देखता ही रह गया।
बेटे ने पूछा – मम्मी तुमने मारा क्यों?
मां ने कहा – पूछता है मारा क्यों? तूने आज मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी।
बेटे ने पूछा – वो कैसे?
मां ने कहा – तूने सबके सामने कहकर कि पेशाब जाना है और हां, अब ध्यान से सुन ले, जब कभी भी ऐसा कुछ करना हो तो कहना कि मां मुझे ‘गीत’ गाना है।
बेटे ने कहा – ठीक है, यही कहूंगा।
बच्चा था सुकुमार बुद्धि, कोमल बुद्धि का। समर्पण में जीना जानता था। तर्क करना तो उसे आता नहीं था। मां ने कहा तो ठीक ही कहा होगा। सभा समाप्त हुई। सब महिलाएं अपने–अपने घर चली गई।
रात का वक्त था। यही कोई बारह बज रहे होंगे। वह अपने पिता के संग सो रहा था। बोला– पिताजी गीत गाना है। मुल्ला नसरूद्दीन समझा – बेटा नींद में बोल रहा है, उसने कोई जवाब न दिया।
थोड़ी देर बाद बेटे ने पुन: कहा – पिताजी – पिताजी गीत गाना है। नसरूद्दीन ने कहा – सो जा, रात में गीत गायेगा, चुपचाप सो जां बेटा चुप हो गया।
दस मिनट बाद फिर बोला – पिताजी। जोरों का गीत गाना है (हंसी)।
मुल्ला ने समझाया – बेटा! सुबह गा लेना। अभी रात है, अभी गीत गायेगा तो तेरी मम्मी की और भैया की नींद हराम हो जाएगी।
लेकिन बेटा तो जिद पकड़ गया कि मैं तो अभी गाऊंगा, इसी वक्त गाऊंगा। मुल्ला नसरूद्दीन परेशान, ‘ अब क्या करूं?’ उसने काफी सोच–विचार कर कहा कि ठीक है, धीरे से मेरे कान में गा ले (जोरदार हंसी) ।
बेटे ने एक बार फिर पूछा – पिताजी गा लूं।
मुल्ला ने कहा – हां–हां, गा ले, लेकिन धीरे से गाना (हंसी) और आगे क्या हुआ होगा, आप स्वयं समझ लें। मैं तुमसे ही पूछता हूं, इसमें गलती किसकी है? मां की है या बेटे की है या मुल्ला नसरूद्दीन की?
उत्तर स्पष्ट है – गलती मां की है। बच्चे तो वही करते हैं, जो देखते हैं। अत: उनके समक्ष ऐसी कोई क्रिया, कोई व्यवहार न करें जिससे उसके कोमल मन पर गलत असर पड़ता हो। बच्चे पान के कोमल पत्ते के समान हैं। पान सूखने के बाद मुड़ता नहीं है। एक निश्चित उम्र गुजरने के बाद बच्चों को संस्कार दे पाना कठिन हो जाता है। एक महिला अपने बच्चे को लेकर आइंस्टीन के पास पहुंची और उनसे पूछा– मैं इसे पढ़ाना चाहती हूं, कब से पढ़ाना शुरू करूं? आइंस्टीन ने पूछा – इसकी उम्र क्या है? महिला ने बताया – पांच वर्ष। आइंस्टीन ने कहा – बहन! तुम बहुत लेट हो गई। अब तक तो इसकी पढ़ाई पूरी हो जानी चाहिए थी, क्योंकि संस्कार तो पांच साल की उम्र तक ही दिए जा सकते हैं।
मुनिश्री ने अत्यंत मार्मिक बात बताते हुए कहा कि यदि सच में तुम चाहते हो कि तुम्हारा बेटा बुढ़ापे में तुम्हारी लाठी बने, तो इसके लिए उसको अभी से मां–बाप के प्रति बेटे का क्या कर्तव्य होता है, यह सबक अपने बूढ़े मां–बाप की सेवा– सुश्रूषा करके बता देना है। आज जो सलूक, जो व्यवहार तुम अपने मां–बाप के साथ करोगे, वैसा ही व्यवहार तो कल तुम्हारा बेटा तुम्हारे साथ करेगा।
आज यदि तुम अपने बेटे की अंगुली पकड़कर उसे मंदिर लाओगे, तभी तो कल जब तुम बूढ़े होंगे तो तुम्हारा बेटा तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हें सम्मेद शिखरजी की वंदना कराएगा (तालियां)।
संसार तो प्रतिध्वनि– मात्र है, यहां तो वहीं मिलता है, जो हम लुटाते हैं। आनंद लुटाते हैं, तो आनंद मिलता है। दु:ख बांटते हैं तो दु:ख मिलता है। बांटना बढ़ाने का मार्ग है, आनंद बांटते चलो, ताकि आनंद बढ़ता चले।

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