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History Of Mewar: विजय स्तंभ या कीर्ति स्तंभ ?

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मेवाड़ की दीर्घ कालीन राजधानी और वीरता के प्रतीक ऐतिहासिक दुर्ग चितौड़गढ़ के सीने पर खड़ा विजय स्तंभ महाराणा कुम्भा द्वारा मालवा अभियान के तत्काल बाद बनवाया गया. इतिहास में वर्णित है कि कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद को केवल युद्ध में हराया ही नहीं, अपितु उसे चितौड़ में छह माह तक बंदी भी बनाये रखा. “बाबरनामा” लिखता है कि महाराणा सांगा को खानवा में हराने के बाद बाबर ने उसके राजकोष से वह मुकुट भी प्राप्त किया जिसे सांगा के दादा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान से जीता था.

किन्तु मेवाड़ में रहकर इतिहास लेखन के दौरान कर्नल जेम्सटोड इन प्रचलित गाथाओं, जिन्हें उन्होंने “चारण गाथा” कहा है, से ज्यादा इत्तेफाक नहीं रखते. जेम्स टोड ने लिखा है, “विजय की इन लोक गाथाओं में लिखित इतिहास से अधिक दीर्घमय एक स्मारक और भी है: चितौड़ में खड़ा विजय स्तंभ, जिसके शिलालेखो में भी मालवा के सुल्तान को बंदी बनाये जाने की बात वर्णित है”. स्पष्ट है कि जेम्स टोड को भी मालवा के सुल्तान को बंदी बनाये जाने को लेकर जो शंकाएं थी, उसे दूर करने के लिए उन्होंने शिलालेखों का सहारा लिया है.

जहाँ तक विजय स्तंभ (इसे यह नाम जेम्स टोड ने ही दिया) के नाम का सवाल है तो इसे शिलालेखों में कीर्ति या विष्णु स्तंभ कहकर सम्मानित किया गया है. यद्यपि मेवाड़ के इतिहास पर कलम चलाने वाले रामवल्लभ सोमानी और राजेन्द्र शंकर भट्ट इसे मालवा विजय का स्मारक नहीं मानते. इस स्तंभ का निर्माण 1438 इस्वी में शुरू हुआ, याने मालवा विजय के तुरंत बाद. दोनों बातों को जोड़े तो माना जा सकता है कि यह स्तंभ केवल विजय या केवल विष्णु पूजित ही नहीं था. इस स्तंभ में विष्णु के विविध अवतारों के अलावा शिव भी है, माता के अवतार भी है, क्षेत्रपाल अथवा भैरव की भी उपसना एवं मूर्तियां मौजूद है. डॉ. गौरीशंकर ओझा ने लिखा है, “मालवा विजय के उपलक्ष्य में महाराणा ने अपने उपास्य देव विष्णु के निमित्त यह विशाल कीर्ति स्तंभ बनवाया, जिसमे मालवा से प्राप्त विशाल धनराशी का प्रयोग किया गया.”

किन्तु इस स्तंभ को केवल विजय स्तंभ कहना पर्याप्त नहीं होगा, क्यंकि इतना उत्तुंग, उत्कृष्ट, संस्कृति का उदात्त उदहारण संसारभर में दूसरा नहीं है.इसको बनवाने वाले महाराणा कुम्भा का चरित्र जितना विशाल और देदीप्यमान है, उतना ही विजय स्तंभ का भी. यह अनुपम, अद्भुत, आश्चर्यकारी है. आकार की उच्चता के अतिरिक्त, मनुष्य की दैवीय अभिकल्पनाओं का साक्षात स्वरुप है.

नौ खंडों (मंजिलों) में बना विजय स्तंभ, जेम्स टोड से पूर्व कीर्ति स्तंभ ही कहलाया, जिसे बनाने में बीस वर्ष का समय लगा. इन बीस वर्षों में कुम्भा के विजय अभियान मालवा, नागौर और गुजरात के मुस्लिम शासकों पर सतत संघर्ष के साथ चलते रहे. यह अद्भुत है कि एक तरफ एक शासक सतत सैन्य कौशल को नियंत्रित करे साथ ही दूसरी तरह स्थापत्य कला की एक अनुपम भेंट भी तैयार करवाता रहे. यह विस्मयकारी है. इसी कारण कुम्भा को इतिहासकारों ने “युद्ध में स्थिर बुद्धि” लिखा है.

किन्तु इस स्तंभ के नामकरण को लेकर उत्पन्न भ्रम अभी तक ज्यो का त्यों है. इसे विजय स्तंभ कहने का प्रबल विरोध प्रो. रामनाथ ने किया है. अपनी एक पुस्तक में इस पर पूरा एक अध्याय लिखकर इस विवाद को हवा ही दी है. लिखते है कि पंडित गोपीनाथ सहित अनेक इतिहासकारों ने कर्नल जेम्स टोड और फर्ग्युसन की शब्द दर शब्द नक़ल ही की. प्रो. रामनाथ विश्वासपूर्वक कहते है कि “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि चितौडगढ का कीर्तिस्तम्भ इस प्रकार लोगों में विजय स्तंभ के रूप में जाना जा रहा है. कीर्ति स्तंभ सामान्य-सी गतिविधि का सैनिक स्मारक नहीं है.” डॉ. नीलिमा मित्तल लिखती है, “ 15वि शताब्दी के सांस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रतीक कीर्ति स्तंभ भ्रमवश किसी सैनिक उपलब्धि के स्मारक स्वरुप “विजय स्तंभ” के रूप में जाना जाता है. इस से इसके मूल अभिप्राय और अवधारणा को लोग भूल गए है.इसके विजय स्तंभ होने का प्रमाण या उल्लेख कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति या किसी अन्य शिलालेख में नहीं मिलता. “अमर काव्य” इसे कीर्ति मेरु लिखता है.

विजय (कीर्ति) स्तंभ नौ मंजिला सुनहरे पत्थर की उत्कृष्ट कृति है. कही ईंट- चुने का प्रयोग नहीं हुआ. सात मंजिल तक अंदर ही अंदर परिक्रमा मार्ग है. आठवी मंजिल अन्य भाग से अलग बनी है,जी सुंदर बारह छतरियों पर टिकी है. आठवी से नवी मंजिल पर जाने की सीडी अब नहीं है. नवे खंड में चार शिलालेख उत्कीर्ण किये गए, जिनमे से दो अभी शेष है. यह 122 फीट ऊँचा है तथा 12 फीट ऊँचे एक चबूतरे पर बना है.

बहरहाल जब हम इस स्तंभ के नाम को लेकर चर्चा कर रहे होते है तो इसके अनेक दूसरे पहलुओं पर अधिक ध्यान नहीं दे पाते. शेष पहलुओं पर कभी किसी और लेख में प्रकाश डालेंगे. (आर्य मनु)

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