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आज बच्छ बारस (वत्स द्वादशी ): चाकू का काटा नहीं खायेंगी माताएं

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प्राचीन हिंदू परंपरा के अनुसार सुहागिनें और माताएं मंगलवार  को बछ बारस (वत्स द्वादशी) पर्व मनाएंगी। इस पर्व में हषरेल्लास के साथ बछड़े वाली गाय की पूजा करते हुए संतान की सकुशलता की कामना की जाएगी। परंपरा के अनुसार इस दिन महिलाएं चाकू से कटी भोजन सामग्री से परहेज करेंगी। उदयपुर शहर के बाईजी राज कुंड, श्रीनाथजी की हवेली सहित कुछ मंदिरों और घरों में पूजा अनुष्ठान होंगे।

 

मक्का की रोटी से खोलेंगी व्रत 
वत्स द्वादशी के मौके पर सुहागिनों द्वारा संतान सुख और माताओं द्वारा संतान की सकुशलता की कामना की जाएगी। इस मौके पर व्रतधारी महिलाएं गाय और बछड़े की पूजा करेंगी। व्रत खोलने के लिए भोजन में कड़ी और मक्का की रोटी, मूंग, चने के बरवे, भुजिया आदि बनाए जाएंगे।

 

संतान को झेलाएंगी खोपरे 
गाय, बछड़े की पूजा के बाद महिलाओं द्वारा अपनी संतान को नारियल और खोपरे झेलाकर, तिलक लगाकर उनकी सकुशलता व लंबी उम्र की कामना की जाएगी। पूजा अनुष्ठान के बाद बहुएं परिवार की बड़ी, बुजुर्ग महिलाओं को चरण स्पर्श किया जाएगा।

 

बछ बारस व्रत की कथा 
एक परिवार में सास और बहू साथ रहती थी। उनके घर में गाय और उसके दो बछड़े थे, जिन्हें सास बच्चों से भी ज्यादा प्यार से रखती थी। घर से पूजा कार्य के लिए निकली सास ने बहू से गंवलिया और जंवलिया (गेहूं व जौ) पकाने को कहा। गाय के बछड़ों का नाम भी गंवलिया और जंवलिया होने से नादान बहू ने दोनों बछड़ों को काट कर पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ा दिया। पूजा कर वापस लौटी सास ने घर में गाय के बछड़े नहीं होने पर बहू से जवाब मांगा। बहू ने कहा कि मैंने गंवलिया और जंवलिया को तो पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ा दिया है। यह सुनकर पीड़ा में डूबी सास ने दोनों बछड़े वापस लौटाने की कामना भगवान से की। ईश्वर की कृपा से वे दोनों बछड़े दौड़कर आ गए, जिन्हें बहू ने चूल्हे पर चढ़ा दिया था।

(साभार: भास्कर 2011)

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